भारत एक ऐसा देश है जो अपने स्वादिष्ट व्यंजनों के लिए जाना जाता है. यहां पर आपको हर तरीके के व्यंजन मिल जाएंगे और इनका अपना अलग इतिहास रहा है. इस लिस्ट में कुछ चटनी ऐसी हैं, जिनका नाम ही सुनकर अजीब लग सकता है. हालांकि, भारत में एक नहीं बल्कि कई तरह की चटनियां बनाई जाती हैं, लेकिन ओडिशा की काई चटनी अपने अनोखे स्वाद और बनाने के तरीके की वजह से बाकी चटनियों से बिल्कुल अलग है. खास बात यह है कि इसमें इस्तेमाल होने वाली लाल बुनकर चींटियों की वजह से यह लंबे समय से चर्चा में रही है. लोग इसे बहुत ही चाव से खाते हैं, जिसकी वजह से इसे जीआई टैग भी मिल चुका है. बता दें जीआई टैग का पूरा नाम जियोग्राफिकल इंडिकेशन यानी भौगोलिक संकेत है.
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क्या है काई चटनी?
काई चटनी ओडिशा के मयूरभंज जिले की पारंपरिक चटनी है. इसे स्थानीय लोग काई कहते हैं. इसे लाल बुनकर चींटियों और उनके अंडों से तैयार किया जाता है. ये चींटियां मयूरभंज के जंगलों, खासकर सिमिलिपाल इलाके में पाई जाती हैं.
कैसे तैयार होती है ये अनोखी चटनी?
काई चटनी बनाने के लिए लाल बुनकर चींटियों और उनके अंडों को इकट्ठा करके साफ किया जाता है. इसके बाद इन्हें स्थानीय मसालों के साथ पीसकर चटनी तैयार की जाती है. अलग-अलग जगहों और परिवारों में इसे बनाने का तरीका थोड़ा अलग हो सकता है. कई लोग इसे अदरक, लहसुन, मिर्च और नमक जैसे मसालों का इस्तेमाल किए जाते हैं.
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स्वाद कैसा होता है?
काई चटनी अपने तीखे, खट्टे और मसालेदार स्वाद के लिए जानी जाती है. लाल चींटियों में मौजूद फॉर्मिक एसिड इसके स्वाद में खट्टापन ला सकता है. यही अनोखा स्वाद इसे दूसरी चटनी से इसे बहुत ही अलग बनाता है.
आदिवासी संस्कृति से जुड़ी है काई चटनी का इतिहास
आप सोच रहे होंगे कि यह चटनी कोई कैसे खा सकता है, लेकिन इसका इतिहास आदिवासी से जुड़ा है. मयूरभंज के कई आदिवासी समुदायों के लिए काई चटनी पारंपरिक खानपान की संस्कृति से भी जुड़ा हुआ है. पहले जंगलों से चींटियों को इकट्ठा किया जाता है फिर उन्हें तैयार किया जाता है.
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