Toilet Goddess Tradition in China: टॉयलेट एक ऐसी जगह है जहां पर लोग हल्का होने के लिए जाते हैं, लेकिन क्या आपको पता है कि दुनिया में एक ऐसी जगह भी मौजूद है जहां पर लोग टॉयलेट के अंदर पूजा करने के लिए जाते हैं? यह सुनकर आपको अजीब लग सकता है, लेकिन क्या किया जाए दुनिया भर में कई ऐसी परंपराएं और मान्यताएं हैं, जिन्हें सुनकर हैरानी होना लाजिमी है. इसकी लिस्ट में ऐसी ही एक अनोखी और थोड़ी अजीब लगने वाली परंपरा भी शामिल है, जहां टॉयलेट और उससे जुड़ी चीजों को खास महत्व दिया जाता है. लोग यहां पर आकर पूजा करना पसंद करते हैं. हालांकि, इस प्रथा के पीछे एक कथा रही है, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं. आइए इस लेख में विस्तार से जानते हैं कि यह प्रथा कहां पर प्रचलित है और क्यों लोग टॉयलेट सीट के सामने हाथ जोड़ते हैं.

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कहां है यह अनोखी जगह?

यह अनोखी चीन में प्रचलित है, जिसे जिगु देवी के नाम से जाना जाता है. कुछ लोग इसे कमोड की रानी भी कहते हैं जहां पर टॉयलेट सीट को पूजा जाता है. लोग मानते हैं कि वह घर की महिलाओं, खासकर दुख झेलने वाली स्त्रियों की रक्षक हैं. साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, लैंटर्न फेस्टिवल के दिन ऐसा किया जाता है और चीनी लूनर कैलेंडर के पहले महीने के 15वें दिन टॉयलेट सीट की पूजा जाती है.

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क्या है इसके पीछे की कहानी?

जिगू की कहानी काफी भावुक और दर्द भरी है. कहा जाता है कि वह एक सुंदर महिला थीं, जो किसी धनी व्यक्ति की रखैल थीं. उस व्यक्ति की पत्नी उनसे जलती थी. ईर्ष्या की वजह से एक दिन पत्नी ने जिगू की निर्दयता से हत्या कर दी और उनका शरीर टॉयलेट में फेंक दिया. इस दुखद घटना के बाद लोगों का मानना है कि उनकी आत्मा वहीं बस गई और धीरे-धीरे उन्हें एक देवी के रूप में पूजा जाने लगा.

कैसे की जाती है पूजा?

ज़िगू की पूजा खासतौर पर लैंटर्न फेस्टिवल के समय की जाती है. लोग टॉयलेट या उससे जुड़े स्थान के पास जाकर उनकी आराधना करते हैं. साथ ही, उनसे भविष्य जानने और सुख-शांति की कामना की जाती है. खास बात यह है कि महिलाएं उनसे अपने जीवन से जुड़ी परेशानियों के समाधान भी मांगती हैं.

क्यों की जाती है जिगू की पूजा?

  • महिला के प्रति सम्मान को बढ़ाना
  • अन्याय के प्रति आवाज उठाना
  • भविष्य जानने के लिए
  • देवी के याद करने के लिए

आज के आधुनिक चीन में यह परंपरा बहुत कम देखने को मिलती है, लेकिन कुछ ग्रामीण इलाकों और पारंपरिक मान्यताओं में यह परंपरा अभी भी शामिल है.

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