भारत में जज बनने के लिए आमतौर पर कानून की पढ़ाई और न्यायिक अनुभव जरूरी होता है, वकालत करनी होती है. लेकिन देश के इतिहास में एक ऐसे मुख्य न्यायाधीश भी हुए, जिन्होंने कानून की डिग्री हासिल नहीं की थी. इसके बावजूद वह सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे और भारत के 10वें मुख्य न्यायाधीश बने. उनका नाम था कैलास नाथ वांचू, जिन्हें K.N. Wanchoo के नाम से भी जाना जाता है. वह भारत के दसवें मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of India यानी CJI) बने और इस पद पर फरवरी 1968 तक रहे. उनकी खास बात यह थी कि वह न तो कानून की डिग्री वाले न्यायाधीश थे और न ही उन्होंने वकील के रूप में प्रैक्टिस की थी. इसके बावजूद वह देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंचे.
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस की बुक ‘Judges of the Supreme Court of India 1950–1989’ के मुताबिक, वांचू भारतीय सिविल सेवा (ICS) से आने वाले और बिना कानून की डिग्री या बैरिस्टर की डिग्री के भारत के मुख्य न्यायाधीश बनने वाले इकलौते व्यक्ति थे. यह कहानी समझने का मौका देती है कि उस समय न्यायपालिका में नियुक्ति के नियम क्या थे और आज के नियम उनसे किस तरह अलग हैं.
कौन थे कैलास नाथ वांचू?
कैलास नाथ वांचू का जन्म मध्य प्रदेश के मंदसौर में एक कश्मीरी पंडित परिवार में 25 फरवरी 1903 को हुआ था. उन्होंने कानपुर के पंडित पृथ्वी नाथ हाई स्कूल और इलाहाबाद के म्योर सेंट्रल कॉलेज में पढ़ाई की. भारत के सर्वोच्च न्यायालय की आधिकारिक वेबसाइट पर उनकी B.A. (इलाहाबाद) की डिग्री लिखी हुई है. इसके बाद उन्होंने 1924 में भारतीय सिविल सेवा यानी ICS की परीक्षा पास की और 1 दिसंबर 1926 को सेवा में शामिल हुए. उस दौर में ICS ब्रिटिश भारत की सबसे प्रभावशाली प्रशासनिक सेवाओं में से एक थी. इसके अधिकारी प्रशासन चलाने, कानून-व्यवस्था बनाए रखने और सरकारी व्यवस्था से जुड़े कई महत्वपूर्ण काम करते थे. वांचू ने भी अपने करियर की शुरुआत इसी सेवा से की. उनकी शुरुआती तैनाती संयुक्त प्रांत में हुई, जिसमें उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड का क्षेत्र आता है. वह सहायक मजिस्ट्रेट और कलेक्टर के पद पर काम करने के बाद जिला एवं सत्र न्यायाधीश बने. इस तरह उनका काम केवल सामान्य प्रशासन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्हें अदालतों और आपराधिक मामलों से जुड़ा अनुभव भी मिला. सुप्रीम कोर्ट ऑब्जर्वर के मुताबिक, ICS की ट्रेनिंग के दौरान उन्हें आपराधिक कानून की शिक्षा भी मिली थी. हालांकि, यह कानून की डिग्री के बराबर नहीं थी.
जिला अदालत से सुप्रीम कोर्ट तक कैसे पहुंचे?
वांचू का न्यायिक करियर कई चरणों में आगे बढ़ा. फरवरी 1947 में उन्हें इलाहाबाद हाईकोर्ट में कार्यवाहक न्यायाधीश नियुक्त किया गया. दिसंबर 1947 में वह न्यायाधीश बने. इसके बाद जनवरी 1951 में उन्हें राजस्थान हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया. राज्यों के पुनर्गठन के बाद भी उन्होंने राजस्थान हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने रहे. 11 अगस्त 1958 को वह सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश बने. करीब नौ साल बाद, 12 अप्रैल 1967 को उन्होंने भारत के मुख्य न्यायाधीश का पद संभाला. सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, वह 24 फरवरी 1968 को रिटायर हुए. उनका कार्यकाल दस महीने से थोड़ा ज्यादा रहा.
उनकी नियुक्तियां यह बताती है कि वांचू के पास केवल प्रशासनिक अनुभव नहीं था. वह जिला न्यायपालिका में काम कर चुके थे, हाईकोर्ट के न्यायाधीश रहे और राजस्थान हाईकोर्ट का नेतृत्व भी कर चुके थे. इसलिए यह कहना ठीक नहीं होगा कि कोई व्यक्ति बिना कानून पढ़े सीधे देश का मुख्य न्यायाधीश बन गया. वह लंबे प्रशासनिक और न्यायिक अनुभव के बाद इस पद तक पहुंचे थे.
उन्हें जज और फिर CJI किसने बनाया?
वांचू की नियुक्तियों को समझने के लिए उनके करियर के अलग-अलग हिस्सों को देखना जरूरी है. 1947 में इलाहाबाद हाईकोर्ट में उनकी नियुक्ति उस समय की प्रशासनिक और संवैधानिक व्यवस्था के तहत हुई थी. बाद में राजस्थान हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में उनकी नियुक्ति हुई और 1958 में राष्ट्रपति के माध्यम से उन्हें सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया गया. 12 अप्रैल 1967 को वह भारत के मुख्य न्यायाधीश बने. उनसे पहले न्यायमूर्ति के. सुब्बा राव इस पद पर थे. सुब्बा राव ने राष्ट्रपति चुनाव लड़ने के लिए 11 अप्रैल 1967 को इस्तीफा दिया था. इसके बाद वांचू ने CJI का पद संभाला.
ऑक्सफोर्ड की बुक में इस बदलाव और उस समय सुप्रीम कोर्ट में नियुक्तियों के तरीके मौजूद हैं. यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश बनना और मुख्य न्यायाधीश बनना दो अलग बात हैं. वांचू पहले सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश बने थे. बाद में उन्हें उसी अदालत का नेतृत्व करने की जिम्मेदारी मिली. इसलिए उनकी कहानी में यह सवाल भी अहम है कि सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश बनने की योग्यता क्या थी और उस समय मुख्य न्यायाधीश चुनने की प्रक्रिया कैसी थी.
क्या के. एन. वांचू के पास कानून की डिग्री नहीं थी?
सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर उनकी B.A. (इलाहाबाद) की डिग्री है. सुप्रीम कोर्ट ऑब्जर्वर और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस की बुक भी बताती है कि उन्होंने कानून की डिग्री हासिल नहीं की थी और वकील के रूप में प्रैक्टिस भी नहीं की थी. इसके बजाय, उन्होंने ICS के अधिकारी के रूप में काम किया और प्रशासनिक तथा न्यायिक पदों पर लंबा अनुभव हासिल किया. इसका मतलब यह नहीं है कि उन्हें कानून की कोई जानकारी नहीं थी. जिला एवं सत्र न्यायाधीश के रूप में काम करने और ICS ट्रेनिंग के दौरान आपराधिक कानून पढ़ने से उन्हें कानून और न्यायिक प्रक्रिया का अनुभव मिला था. लेकिन कानून की जानकारी का अनुभव और LLB जैसी औपचारिक डिग्री एक ही चीज नहीं हैं. वांचू के मामले में यही अंतर सबसे अहम है.
क्या आज बिना लॉ डिग्री के जज बना जा सकता है?
इस सवाल का जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि किस अदालत में और कौन से जज बनने की बात हो रही है. भारत में जिला अदालतों, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के लिए अलग-अलग संवैधानिक प्रावधान और भर्ती या नियुक्ति की प्रक्रियाएं हैं.
निचली अदालतों में जज बनने के नियम
निचली न्यायपालिका में सिविल जज या न्यायिक मजिस्ट्रेट जैसे पदों पर भर्ती आम तौर पर राज्य की न्यायिक सेवा परीक्षा और सेवा नियमों के तहत होती है. इन पदों के लिए कानून की डिग्री जरूरी होती है. भर्ती की शर्तें राज्य और पद के अनुसार होती हैं. जिला न्यायाधीश के पद के लिए संविधान का अनुच्छेद 233 अलग व्यवस्था बताता है. न्यायिक सेवा से बाहर के व्यक्ति को जिला न्यायाधीश नियुक्त करने के लिए कम से कम सात साल तक अधिवक्ता या प्लीडर रहने और हाईकोर्ट की सिफारिश की शर्त है. अनुच्छेद 234 जिला न्यायाधीशों के अलावा राज्य की न्यायिक सेवा में नियुक्तियों की प्रक्रिया से संबंधित है.
हाईकोर्ट का जज बनने की योग्यता
संविधान के अनुच्छेद 217 के अनुसार, हाईकोर्ट का न्यायाधीश बनने के लिए व्यक्ति का भारतीय नागरिक होना जरूरी है. इसके साथ उसे कम से कम दस साल तक भारत में न्यायिक पद पर काम करने का अनुभव होना चाहिए या किसी हाईकोर्ट में कम से कम दस साल तक अधिवक्ता होना चाहिए. इसलिए आज किसी व्यक्ति का सिर्फ प्रशासनिक अधिकारी होना अपने आप में उसे हाईकोर्ट का जज नियुक्त करने के लिए काफी नहीं है. उसे संविधान की जरूरी योग्यता पूरी करनी होगी.
सुप्रीम कोर्ट का जज बनने की योग्यता
संविधान का अनुच्छेद 124(3) सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश बनने की योग्यता बताता है. इसके तहत व्यक्ति भारतीय नागरिक होना चाहिए और उसे कम से कम कोई एक शर्त पूरी करनी होती है:
- कम से कम पांच साल तक किसी हाईकोर्ट का न्यायाधीश रहा हो.
- कम से कम दस साल तक किसी हाईकोर्ट में अधिवक्ता रहा हो.
- राष्ट्रपति की राय में वह एक ‘प्रतिष्ठित विधिवेत्ता'(Distinguished Jurist) हो.
आज सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति कैसे होती है?
आज सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम व्यवस्था लागू है. सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम में भारत के मुख्य न्यायाधीश और वरिष्ठ न्यायाधीश शामिल होते हैं. नियुक्ति की प्रक्रिया में कॉलेजियम की सिफारिश के बाद केंद्र सरकार और राष्ट्रपति की भूमिका भी अहम होती है. इसलिए आज किसी प्रशासनिक अधिकारी को केवल इसलिए सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त नहीं किया जा सकता कि उसने लंबे समय तक सरकारी सेवा की है. उसे संविधान में दी गई योग्यता पूरी करनी होगा और नियुक्ति की प्रक्रिया से गुजरना होगा.
यहां वांचू के समय और आज के बीच अंतर समझना जरूरी है. वांचू ने ब्रिटिश शासन के दौरान ICS में काम किया था. आजादी के बाद वह न्यायिक पदों पर पहुंचे और फिर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश बने. आज भारतीय प्रशासनिक सेवा यानी IAS में काम करने वाला अधिकारी केवल अपनी प्रशासनिक सेवा के आधार पर न्यायाधीश बनने के लायक नहीं हो जाता. उसे न्यायाधीश नियुक्त करने के लिए लागू संवैधानिक योग्यता पूरी करनी होगी.
क्या आज कोई दूसरा वांचू बन सकता है?
इसका जवाब पूरी तरह हां या ना में देना सही नहीं होगा. अगर सवाल यह है कि क्या आज कोई व्यक्ति बिना कानून की डिग्री और बिना वकील के रूप में प्रैक्टिस किए सीधे हाईकोर्ट का न्यायाधीश बन सकता है, तो नियुक्ति में उसे संविधान की जरूरी योग्यताएं पूरी करनी होंगी. केवल प्रशासनिक तजुर्बा काफी नहीं है.
लेकिन सुप्रीम कोर्ट के लिए संविधान के अनुच्छेद 124(3) तहत राष्ट्रपति की राय में प्रतिष्ठित विधिवेत्ता होना भी है. इस प्रावधान में कानून की डिग्री की अलग से शर्त नहीं लिखी गई है. फिर भी यह कहना गलत होगा कि कोई भी गैर-वकील आज आसानी से सुप्रीम कोर्ट या मुख्य न्यायाधीश के पद तक पहुंच सकता है. हालांकि, इस प्रावधान के तहत इतिहास में अब तक किसी को सीधे सुप्रीम कोर्ट का जज नियुक्त नहीं किया गया है.
मुख्य न्यायाधीश के रूप में उनका कार्यकाल
कैलास नाथ वांचू ने 12 अप्रैल 1967 को भारत के मुख्य न्यायाधीश का पद संभाला और 24 फरवरी 1968 को रिटायर हुए. उनका कार्यकाल बहुत लंबा नहीं था, लेकिन उनकी नियुक्ति भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में अलग है. वह ICS से आने वाले ऐसे न्यायाधीश थे, जिन्होंने कानून की औपचारिक डिग्री या बैरिस्टर की योग्यता के बिना देश के सर्वोच्च न्यायिक पद तक का सफर तय किया. उनका करियर यह भी दिखाता है कि न्यायपालिका में किसी व्यक्ति की नियुक्ति को समझने के लिए केवल उसकी डिग्री देखना काफी नहीं है. उस समय के नियम, नियुक्ति की प्रक्रिया, पहले के पदों पर मिला अनुभव और संविधान के प्रावधान भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं.
हालांकि, उनकी कहानी को यह कहकर पेश करना कि आज कोई भी व्यक्ति बिना लॉ डिग्री के जज बन सकता है, सही नहीं होगा. निचली अदालतों और हाईकोर्ट में नियुक्ति के लिए जरूरी योग्यताएं हैं.
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