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दिल्ली सरकार का एक साल पूरा होने पर दिल्ली वाले क्यों कर रहे हैं केजरीवाल को याद

दिल्ली में भाजपा सरकार के एक साल पूरे होने पर सोशल मीडिया पर #SufferingDelhiMissesKejriwal ट्रेंड कर रहा है. लोग मौजूदा हालात की तुलना अरविंद केजरीवाल सरकार के दौर से करते हुए राजधानी की राजनीति पर नई बहस छेड़ रहे हैं.

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भारत की राजधानी दिल्ली इन दिनों एक गहरी राजनीतिक बहस के बीच खड़ी है. सोशल मीडिया पर #SufferingDelhiMissesKejriwal ट्रेंड कर रहा है और यह ट्रेंड सिर्फ ऑनलाइन शोर नहीं, बल्कि उस भावना का प्रतीक बन गया है जो कई इलाकों में सुनाई दे रही है. लोग बीते दौर और मौजूदा हालात की तुलना कर रहे हैं.

फरवरी 2025 से पहले जब अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी की सरकार थी, तब दिल्ली की जनता का कहना था कि दिल्ली में शासन की दिशा बदली थी. मोहल्ला क्लीनिकों को आम लोगों के लिए राहत का केंद्र बताया जाता था, जहां बिना जेब पर बोझ डाले इलाज मिल जाता था. सरकारी स्कूलों को नया रूप दिया गया था, कक्षाओं का ढांचा सुधरा था और रिजल्ट पर चर्चा होती थी. बिजली और पानी पर राहत को मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों के लिए सीधी मदद के रूप में पेश किया गया. उस समय “दिल्ली मॉडल” की चर्चा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होती थी, और सरकार खुद को आम आदमी की आवाज बताती थी.

लेकिन फरवरी 2025 के बाद जब भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी और मुख्यमंत्री पद संभाला रेखा गुप्ता ने, तो राजनीतिक कथा बदल गई. आम आदमी पार्टी का कहना है कि एक साल के भीतर व्यवस्था की प्राथमिकताएं बदल गईं. कई जगहों से यह शिकायत सुनाई दे रही है कि मोहल्ला क्लीनिकों की रफ्तार धीमी पड़ी है. ट्रैफिक जाम की समस्या फिर चर्चा में है. प्रदूषण को लेकर सख्त और प्रभावी कार्रवाई की कमी की बात कही जा रही है. कुछ इलाकों में पानी की सप्लाई को लेकर असंतोष है और सफाई व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं.

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सरकार विकास और नई योजनाओं की बात करती है, लेकिन आम आदमी पार्टी इसे जमीनी हकीकत से कटा हुआ दावा बता रहा है. सोशल मीडिया पर पोस्ट, कॉलोनियों में बातचीत और स्थानीय चर्चाओं में यह तुलना लगातार दिख रही है कि क्या पहले हालात बेहतर थे. लोग कहते हैं कि पहले बिजली बिल को लेकर राहत महसूस होती थी, सरकारी स्कूलों पर भरोसा बढ़ा था और पास में स्वास्थ्य सुविधा मिल जाती थी. अब वे पूछ रहे हैं कि क्या मौजूदा सरकार इन रोजमर्रा की समस्याओं का समाधान उसी प्राथमिकता से करेगी.

दिल्ली की राजनीति हमेशा राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करती रही है. एक साल किसी भी सरकार के लिए शुरुआती आकलन का समय होता है, लेकिन राजधानी की जनता की अपेक्षाएं अधिक हैं. विपक्ष इस ट्रेंड को जनता की आवाज बता रहा है, जबकि सरकार इसे राजनीतिक नैरेटिव कहकर खारिज करती है. सच्चाई का अंतिम फैसला जनता ही करेगी, लेकिन इतना स्पष्ट है कि राजधानी में बहस तेज है.

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दिल्ली आज तुलना के मोड़ पर खड़ी है. एक तरफ वह दौर है जिसे समर्थक बदलाव और राहत का समय बताते हैं, दूसरी तरफ वर्तमान है जिसे लेकर असंतोष की आवाजें उठ रही हैं. सवाल यही है कि क्या मौजूदा सरकार इन चिंताओं को दूर कर पाएगी, या दिल्ली की सियासत में फिर किसी बड़े बदलाव की भूमिका तैयार हो रही है.

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