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SMARR रियल्टी से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में जांच तेज, कलकत्ता हाईकोर्ट की निगरानी में ED और CBI की भूमिका बढ़ी

कलकत्ता हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद SMARR रियल्टी से जुड़े कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले की जांच तेज हो गई है, जिसमें शेल कंपनियों और जटिल वित्तीय लेनदेन के जरिए ₹19 करोड़ की अवैध राशि को वैध बनाने का आरोप है, जबकि कुल घोटाले का दायरा ₹1000 करोड़ से अधिक होने की आशंका जताई जा रही है.

Author Edited By : Bhawna Dubey
Updated: Jan 22, 2026 17:27

SMARR रियल्टी से जुड़े कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में जांच ने तेजी पकड़ ली है. यह कंपनी पहले विकास सूर्या ग्रुप के नाम से संचालित होती थी. कलकत्ता उच्च न्यायालय के हालिया निर्देशों के बाद इस मामले में केंद्रीय एजेंसियों की निगरानी और न्यायिक पर्यवेक्षण बढ़ गया है, जिससे जांच प्रक्रिया को नई दिशा मिली है.

मामला बिश्नुपुर थाना कांड संख्या 432/2025 से जुड़ा है, जो व्यवसायी दीपक कुमार लोहिया की शिकायत पर दर्ज किया गया था. शिकायत में आरोप है कि SMARR रियल्टी के प्रमोटर्स से संबद्ध कुछ कंपनियों ने शेल कंपनियों और जटिल, बहु-स्तरीय वित्तीय लेनदेन के माध्यम से लगभग ₹19 करोड़ की राशि को मनी लॉन्ड्रिंग के जरिए वैध बनाया. शिकायतकर्ता का दावा है कि यदि विस्तृत फॉरेंसिक जांच की जाए, तो कथित अनियमितताओं का कुल दायरा ₹1,000 करोड़ से अधिक तक पहुंच सकता है.

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हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी

सुनवाई के दौरान कलकत्ता हाईकोर्ट ने यह संज्ञान लिया कि नोटिस दिए जाने के बावजूद प्रवर्तन निदेशालय (ED) और केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की ओर से कोई प्रतिनिधि उपस्थित नहीं हुआ. इसके बाद अदालत ने दोनों एजेंसियों को विधिवत रूप से सूचित करने का निर्देश दिया. साथ ही यह भी आदेश दिया गया कि अदालत की पूर्व अनुमति के बिना मामले में कोई अंतिम रिपोर्ट दाखिल नहीं की जाएगी. इससे जांच प्रक्रिया न्यायिक निगरानी के दायरे में आ गई है.

रीब्रांडिंग के बाद बढ़ी जांच की गहराई

शिकायत और उपलब्ध दस्तावेज़ों के अनुसार, समूह ने पहले विकास सूर्या ग्रुप के नाम से कारोबार किया और बाद में इसका नाम बदलकर SMARR रियल्टी कर दिया गया. जांच एजेंसियां यह पड़ताल कर रही हैं कि इस रीब्रांडिंग का कथित वित्तीय लेनदेन, स्वामित्व संरचना और फंड मूवमेंट से कोई संबंध है या नहीं.

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शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि रियल एस्टेट, हॉस्पिटैलिटी, फाइनेंस, फिटनेस और एंटरटेनमेंट क्षेत्रों से जुड़ी कई कंपनियों के माध्यम से शेयर प्रीमियम को कृत्रिम रूप से बढ़ाया गया, बाद में फेस वैल्यू पर बायबैक किया गया और फिर मर्जर के जरिए धनराशि को ऑपरेटिंग कंपनियों में समाहित किया गया.

ED की स्थिति

प्रवर्तन निदेशालय ने पहले कहा था कि उस समय तक कोई औपचारिक जांच शुरू नहीं की गई थी. हालांकि, कानूनी जानकारों का मानना है कि हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद मामले में केंद्रीय एजेंसियों की भूमिका अधिक सक्रिय हो सकती है और जांच की गति तथा दायरा दोनों बढ़ सकते हैं.

First published on: Jan 22, 2026 05:27 PM

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