बाबा रामदेव के अनुसार, स्टिंगिंग नेटल एक बेहद फायदेमंद जड़ी-बूटी है, जिसका इस्तेमाल आयुर्वेद में शरीर में खून का संचार बढ़ाने और एनर्जी देने के लिए किया जाता है. उन्होंने बताया कि इसमें भरपूर मात्रा में आयरन होता है, जो हीमोग्लोबिन लेवल बढ़ाने और खून की कमी दूर करने में मदद कर सकता है.
स्टिंगिंग नेटल को वैज्ञानिक तौर पर अर्टिका डायोइका कहा जाता है. यह पौधा भारत के पहाड़ी इलाकों जैसे उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में पाया जाता है. इसे छूने पर त्वचा में जलन और चुभन महसूस होती है, इसलिए इसे संभलकर इस्तेमाल किया जाता है.
उन्होंने बताया कि कुछ पुराने और पारंपरिक इलाज में इस पौधे का इस्तेमाल लकवे (पैरालिसिस) से जुड़ी थेरेपी में भी किया जाता है. खून के बहाव को बेहतर बनाने के लिए इस पौधे का इस्तेमाल बहुत हल्के और सावधानी से किया जाता है. इसे शरीर के उस हिस्से पर धीरे-धीरे फेरते हैं, जहां खून का संचार कम होता है, ताकि वहां खून का बहाव बढ़े और बीमारी में आराम मिले.
कई जगहों पर इस जड़ी-बूटी को सब्जी की तरह भी खाया जाता है. इसे साग के रूप में पकाया जाता है और खास तरीके से तैयार किया जाता है, ताकि इसकी चुभन खत्म हो जाए.
अपनी बात को खत्म करते हुए, उन्होंने लोगों से कहा कि बेवजह की केमिकल वाली दवाइयों से दूर रहें, प्राकृतिक इलाज को अपनाएं और एक हेल्दी, सादा और अनुशासित जीवनशैली अपनाएं. जिससे आपको एक निरोगी काया मिलें.
बाबा रामदेव के अनुसार, स्टिंगिंग नेटल एक बेहद फायदेमंद जड़ी-बूटी है, जिसका इस्तेमाल आयुर्वेद में शरीर में खून का संचार बढ़ाने और एनर्जी देने के लिए किया जाता है. उन्होंने बताया कि इसमें भरपूर मात्रा में आयरन होता है, जो हीमोग्लोबिन लेवल बढ़ाने और खून की कमी दूर करने में मदद कर सकता है.
स्टिंगिंग नेटल को वैज्ञानिक तौर पर अर्टिका डायोइका कहा जाता है. यह पौधा भारत के पहाड़ी इलाकों जैसे उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में पाया जाता है. इसे छूने पर त्वचा में जलन और चुभन महसूस होती है, इसलिए इसे संभलकर इस्तेमाल किया जाता है.
उन्होंने बताया कि कुछ पुराने और पारंपरिक इलाज में इस पौधे का इस्तेमाल लकवे (पैरालिसिस) से जुड़ी थेरेपी में भी किया जाता है. खून के बहाव को बेहतर बनाने के लिए इस पौधे का इस्तेमाल बहुत हल्के और सावधानी से किया जाता है. इसे शरीर के उस हिस्से पर धीरे-धीरे फेरते हैं, जहां खून का संचार कम होता है, ताकि वहां खून का बहाव बढ़े और बीमारी में आराम मिले.
कई जगहों पर इस जड़ी-बूटी को सब्जी की तरह भी खाया जाता है. इसे साग के रूप में पकाया जाता है और खास तरीके से तैयार किया जाता है, ताकि इसकी चुभन खत्म हो जाए.
अपनी बात को खत्म करते हुए, उन्होंने लोगों से कहा कि बेवजह की केमिकल वाली दवाइयों से दूर रहें, प्राकृतिक इलाज को अपनाएं और एक हेल्दी, सादा और अनुशासित जीवनशैली अपनाएं. जिससे आपको एक निरोगी काया मिलें.