लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की है. बीते दिन कनॉट प्लेस से सुप्रीम कोर्ट तक INDIA ब्लॉक के मार्च के बाद राहुल गांधी समेत 11 नेताओं ने एक याचिका दायर की, जिसमें वोट चोरी, SIR और CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई. भारतीय चुनाव आयोग (ECI) के ऑनलाइन डेटाबेस पर सवाल उठाए गए. राहुल गांधी मुख्य याचिकाकर्ता हैं और उनके अलावा कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव, RJD नेता तेजस्वी यादव, माकपा नेता MA बेबी, TMC नेता सौगत राय, NCP-SP नेता सुप्रिया सुले, शिवसेना UBT नेता संजय राउत, IUML नेता टी बशीर भी याचिकाकर्ता हैं.
याचिका में राहुल गांधी की मांगें और उठाए गए सवाल
बता दें कि राहुल गांधी की याचिका में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के फैसले को अवैध घोषित करने की मांग है. SIR प्रक्रिया की कानूनी वैधता जांचने का अनुरोध है. याचिका में सवाल पूछा गया है कि क्या चुनाव आयोग ने SIR कराकर अपनी शक्तियों का दुरुपयोग यानी शक्तियों का छद्म प्रयोग किया है? मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के अधिकारों, वोटर लिस्ट से नाम हटाने की प्रक्रिया और भारतीय चुनाव आयोग के ऑनलाइन डेटाबेस की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए गए हैं. सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में स्वतंत्र जांच समिति बनाने की मांग है. सवाल पूछा गया है कि क्या कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करते हुए SIR कराने का फैसला किया गया? क्या CEC ने अन्य दोनों चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना फैसले लिए?
याचिका में क्या-क्या मांगें की गई हैं, आइए जानते हैं…
क्या CEC ने अकेले फैसले लिए? राहुल गांधी की याचिका का सबसे अहम मुद्दा CEC ज्ञानेश कुमार हैं, जिन पर सवाल उठाया गया है कि क्या उन्होंने दोनों चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना फैसले लिए हैं? इसके लिए 23 सितंबर 2026 को पब्लिश हुई एक मीडिया रिपोर्ट को आधार बनाया गया है, जिसके अनुसार चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर संधू ने पिछले 10 महीनों में 14 मामलों पर आपत्तियां जताई थीं. लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त ने इन पर ध्यान नहीं दिया और न ही ध्यान देना जरूरी समझा.
SIR किसकी मंजूरी से कराया जा रहा? याचिका में चुनाव आयोग के 24 जून 2025 के आदेश पर सवाल उठाया गया है. बताया गया है कि 28 जुलाई 2025 को एक RTI दाखिल की गई थी, जिसमें SIR को मंजूरी वाली फाइलें मांगी गई थीं. लेकिन जवाब में सिर्फ आदेश की कॉपी दी गई, जिसमें पूरे देश में SIR कराने की डिटेल थी. 26 सितंबर 2026 को चुनाव आयोग ने प्रेस रिलीज जारी करके मामले में सर्वसम्मति से मंजूरी मिलने का दावा किया, जबकि दोनों चुनाव आयुक्तों ने सहमति लिए जाने से इनकार किया है. इसलिए याचिका में मंजूरी वाली फाइल मंगाकर जांच की मांग की गई है.
याचिका में जुलाई 2026 में फॉर्म-6 में बदलाव पर सवाल उठाए गए और बदलावों को गैर-कानूनी बताया गया. याचिका के अनुसार फॉर्म बदलकर वोटरों से जानकारी मांगी गई कि उनका या उनके रिश्तेदारों का नाम पिछले SIR की वोटर लिस्ट में था या नहीं. लेकिन फॉर्म में बदलाव करने के लिए निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम 1960 में संशोधन नहीं किया गया था. 5 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट किया था कि उसने संशोधित फॉर्म-6 को मंजूर नहीं किया था.
याचिका में ECINET और ERONET का स्वतंत्र ऑडिट कराने की मांग की गई है. सवाल पूछा गया है कि वोटर्स के रिकॉर्ड को बदलने का अधिकार किसके पास है? क्या बदलावों के बाद रिकॉर्ड सुरक्षित रहता है?
याचिका में आरोप लगाया गया है कि SIR कराकर राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से 13 करोड़ मतदाताओं के नाम हटा दिए गए हैं. हालांकि चुनाव आयोग कहता है कि इतने वोटरों के नाम हटाने की प्रक्रिया फाइनल नहीं हुई है, लेकिन ड्राफ्ट लिस्टों के अनुसार इतने नाम हटाए गए हैं तो जांच होनी चाहिए कि नाम कैसे-क्यों और किस आधार पर हटाए गए हैं.
याचिका में फॉर्म-7 के जरिए वोटरों के नाम हटाने से जुड़ी आपत्तियों का मुद्दा उठाया गया है. याचिका में आरोप लगाया गया है कि कई आपत्तियां फर्जी हैं और फर्जी नामों से दायर हुई हैं. विशेष समुदायों और महिलाओं को निशाना बनाया गया है. नोटिस दिए बिना और सुनवाई किए बिना नाम हटाए गए हैं. वोटरों के अधिकार की सुरक्षा के उपायों और जवाबदेही की मांग है.
याचिका में SIR के अलावा इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVM) के वर्क प्रोसेस की जांच कराने की मांग भी की गई है. इलेक्शन कमीशन ऑनलाइन डेटाबेस, SIR और EVM की जांच कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस की अध्यक्षता में कमेटी गठित करने की मांग की गई है. चुनाव आयोग के फैसले लेने की प्रक्रिया और संवैधानिक शक्तियों के इस्तेमाल की वैधता की जांच कराने की मांग की गई है.