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सियासत के पर्दे पर विजय का धमाकेदार आगाज! दशकों पुराने किलों को ढहाकर 'रियल हीरो' बने थलापति विजय

पहली चुनावी पारी में थलापति विजय ने शानदार बढ़त बनाकर दशकों पुरानी द्रविड़ राजनीति को हिला दिया है. रुझानों में स्टालिन सरकार के खिलाफ भारी आक्रोश और बदलाव की लहर दिख रही है.

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तमिलनाडु की राजनीति में आज का दिन एक बड़े बदलाव के गवाह के रूप में दर्ज हो गया है. फिल्मों के ‘थलापति’ कहे जाने वाले जोसेफ विजय ने अपनी नई पार्टी ‘तमिलगा वेत्री कड़गम’ (TVK) के साथ राज्य की सत्ता में ऐसी एंट्री मारी है जिसने डीएमके और एआईएडीएमके जैसी दिग्गज पार्टियों के वर्चस्व को हिलाकर रख दिया है. दशकों तक करुणानिधि और जयललिता के उत्तराधिकारियों के इर्द-गिर्द घूमने वाली तमिलनाडु की सत्ता में यह बदलाव ठीक वैसा ही है जैसा कभी एमजीआर ने अपनी नई पार्टी बनाकर किया था. विजय ने रील लाइफ की लोकप्रियता को रियल लाइफ की राजनीतिक ताकत में बदलकर खुद को एक मंझा हुआ खिलाड़ी साबित कर दिया है.

लोकलुभावन वादे और युवाओं का जबरदस्त साथ

विजय की इस कामयाबी के पीछे उनकी बरसों की मेहनत और जनता से सीधा जुड़ाव रहा है. उन्होंने साल 2009 से ही अपने प्रशंसक क्लबों को एकजुट कर समाज सेवा के जरिए जमीन तैयार करना शुरू कर दिया था. इस चुनाव में उन्होंने 6 फ्री सिलेंडर, महिलाओं को हर महीने ढाई हजार रुपये और बिजली के साथ-साथ बेरोजगारों को भत्ते जैसे बड़े वादे किए जिसने सीधे मध्यम वर्ग और युवाओं के दिल में जगह बनाई. यही वजह रही कि इस बार राज्य में 90 फीसदी से ज्यादा वोटिंग हुई और 18 से 40 साल के युवाओं ने भारी संख्या में निकलकर पारंपरिक द्रविड़ राजनीति की नींद उड़ा दी.

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स्टालिन की पिछड़ती साख और सनातन विवाद का असर

रुझानों में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि खुद मुख्यमंत्री एम के स्टालिन कोलाथुर सीट पर पिछड़ते नजर आए और उनके कई मंत्री भी हार की कगार पर हैं. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि डीएमके के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर के अलावा उदयनिधि स्टालिन के सनातन विरोधी बयानों ने भी पार्टी को भारी नुकसान पहुंचाया है. सनातन की तुलना बीमारियों से करने वाले बयान को बीजेपी और अन्य दलों ने हिंदू विरोध के तौर पर पेश किया जिससे ग्रामीण और मध्यम वर्गीय मतदाता नाराज हो गए. मतदाताओं का यह गुस्सा साफ तौर पर द्रविड़ राजनीति के खिलाफ एक बड़े झटके के रूप में दिखाई दे रहा है.

बहुमत का गणित और भविष्य की बड़ी चुनौतियां

भले ही विजय सरकार बनाने की ओर बढ़ रहे हैं लेकिन 118 सीटों के जादुई आंकड़े तक पहुंचना उनके लिए अभी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है. बीजेपी और कांग्रेस जैसी पार्टियां समर्थन देकर भी उन्हें बहुमत तक पहुंचाने में शायद ही सक्षम हों और विरोधी दलों से हाथ मिलाना विजय के लिए अपने सिद्धांतों से समझौता करने जैसा होगा. भ्रष्टाचार मुक्त तमिलनाडु और नशा मुक्त समाज का नारा देने वाले विजय के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि वह अपनी सरकार बनाने के लिए किसे साथ लेंगे. फिलहाल यह जीत दशकों से चले आ रहे दो दलों के वर्चस्व के खात्मे और एक नए राजनीतिक युग की शुरुआत का साफ संकेत है.

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