सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल को लेकर एक ऐतिहासिक और बड़ा फैसला सुनाया है. अदालत ने उम्र के आधार पर इंटरनेट के इस्तेमाल पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने की मांग को खारिज कर दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि इंटरनेट तक पहुंच और उसका इस्तेमाल करना बच्चों का भी मौलिक अधिकार है. अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा और उनकी इंटरनेट आजादी एक-दूसरे के खिलाफ नहीं हैं. बच्चों को इंटरनेट से दूर कर देना पूरी तरह अनुचित होगा. नियमों और सुरक्षा के ऐसे इंतजाम होने चाहिए, जिससे बच्चों के अधिकार छीने बिना उन्हें सुरक्षित रखा जा सके.
पूरी तरह पाबंदी लगाने से बढ़ सकता है खतरा
सुप्रीम कोर्ट ने आगाह किया कि अगर बच्चों पर उम्र के आधार पर सख्त पाबंदी लगाई गई, तो इसका उल्टा असर हो सकता है. ऐसे प्रतिबंध बच्चों को अनियंत्रित और ज्यादा खतरनाक वेबसाइटों की तरफ धकेल सकते हैं. इसके अलावा, यदि किसी बच्चे के साथ ऑनलाइन कोई गलत हरकत, धमकी या शोषण होता है, तो वह पकड़े जाने या सजा के डर से अपने माता-पिता को बताने में भी झिझकेगा. यह टिप्पणी उस समय सामने आई है जब केंद्र सरकार ने हाल ही में 18 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए आईटी नियमों में बदलाव की बात कही थी. इससे पहले आंध्र प्रदेश सरकार भी 16 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया पर रोक लगाने पर विचार कर रही थी.
आपत्तिजनक कंटेंट न हटने पर सोशल मीडिया कंपनियों को फटकार
अदालत ने इंटरनेट पर बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM) के लगातार बने रहने पर गहरी चिंता जताई. कोर्ट ने कहा कि मौजूदा नियमों के बावजूद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और नियामक एजेंसियां ठोस कदम उठाने में नाकाम रही हैं.
कोर्ट ने पाया कि जब किसी एक प्लेटफॉर्म पर आपत्तिजनक कंटेंट हटता है, तो दूसरे प्लेटफॉर्म पर वह अपने आप ब्लॉक नहीं होता, जिससे वह लगातार फैलता रहता है. कोर्ट ने साफ चेतावनी दी कि अब एजेंसियां और कंपनियां हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठ सकतीं, बच्चों की सुरक्षा के लिए कड़े कदम तुरंत उठाने होंगे.
बनेगा नेशनल डेटाबेस, एक साथ हर जगह से हटेगा कंटेंट
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को एक नेशनल डेटाबेस तैयार करने के निर्देश दिए हैं, जिसमें आपत्तिजनक सामग्री के डिजिटल फिंगरप्रिंट और URL शामिल होंगे. मौजूदा समय में सबसे बड़ी कमी यह थी कि जब कोई आपत्तिजनक वीडियो या तस्वीर एक प्लेटफॉर्म से हटाई जाती थी, तो वह बाकी सोशल मीडिया ऐप्स पर घूमती रहती थी. नया सिस्टम बनने के बाद अगर कोई आपत्तिजनक कंटेंट एक जगह पकड़ा जाएगा तो सभी प्लेटफॉर्म्स उसे तुरंत पहचान सकेंगे और हर जगह से हटा सकेंगे.
गलत तरीके से कंटेंट हटाने पर रोक और शिकायत निवारण
अदालत ने यह भी साफ किया कि इस सिस्टम के नाम पर किसी सही सामग्री को गलत तरीके से न हटाया जाए. किसी एक शिकायत के आधार पर आंख मूंदकर कंटेंट डिलीट नहीं किया जाएगा. डेटाबेस में जोड़ने या हटाने से पहले पूरी जांच और वेरिफिकेशन जरूरी होगा. अगर किसी का सही कंटेंट गलती से ब्लॉक या डिलीट हो जाता है, तो उसके लिए एक मजबूत शिकायत निवारण तंत्र होना चाहिए. कोर्ट ने सख्त हिदायत दी कि इस डेटाबेस का इस्तेमाल सिर्फ बच्चों की सुरक्षा के लिए होगा, इसे किसी अन्य तरह के कंटेंट को हटाने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.
प्राइमरी स्कूल से ही बच्चों को किया जाएगा जागरूक
सुप्रीम कोर्ट ने केवल तकनीक पर निर्भर रहने के बजाय जागरूकता पर भी बड़ा जोर दिया. अदालत ने कहा कि प्राइमरी स्कूल स्तर से ही बच्चों के लिए विशेष जागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिए. इससे बच्चे इंटरनेट के खतरों, झांसों और धमकियों को समझ सकेंगे और जरूरत पड़ने पर बिना किसी डर के बड़ों से मदद मांग सकेंगे.