यौन अपराधों से जुड़े मामलों की सुनवाई को अधिक संवेदनशील और पीड़ित-केंद्रित बनाने के उद्देश्य से सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए हैं. शीर्ष अदालत ने कहा है कि न्यायिक आदेशों, फैसलों और सुनवाई के दौरान ऐसी भाषा का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए, जिससे पीड़िता की गरिमा प्रभावित हो.
सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से ‘लज्जा भंग’, ‘बेबस महिला’, ‘चरित्रहीन’, ‘आदतन’, ‘उकसाने वाली’ या इसी तरह के अन्य शब्दों और टिप्पणियों से बचने पर जोर दिया. अदालत का कहना है कि इस प्रकार की भाषा न केवल पीड़िता को लेकर बनी पुरानी सामाजिक धारणाओं को बढ़ावा देती है, बल्कि न्याय प्रक्रिया की निष्पक्षता पर भी असर डाल सकती है.
अदालत ने कहा कि किसी भी यौन अपराध के मामले में पीड़िता के चरित्र, पहनावे, जीवनशैली या निजी संबंधों को अपराध की गंभीरता तय करने का आधार नहीं बनाया जा सकता. न्यायिक प्रक्रिया का केंद्र केवल मामले के साक्ष्य और कानून के अनुरूप उपलब्ध तथ्यों पर होना चाहिए.
गाइडलाइंस में यह भी कहा गया है कि अदालतें, जांच एजेंसियां और अभियोजन पक्ष ऐसी भाषा अपनाएं जो सम्मानजनक और संवेदनशील हो. न्यायिक दस्तावेजों में ऐसे शब्दों या वाक्यों से परहेज किया जाए, जिनसे यह संदेश जाए कि अपराध के लिए किसी भी रूप में पीड़िता जिम्मेदार थी.
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यौन अपराध के मामलों में सहमति (Consent) का आकलन केवल रूढ़िवादी धारणाओं के आधार पर नहीं किया जा सकता. हर मामले के तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों का निष्पक्ष मूल्यांकन किया जाना चाहिए.
125 फैसलों के अध्ययन के बाद तैयार हुई रिपोर्ट
‘जजमेंट्स एंड जेंडर: सेंसिटिविटी एंड कम्पैशन इन राइटिंग जजमेंट्स’ शीर्षक वाली इस रिपोर्ट को देशभर की ट्रायल कोर्ट के 125 न्यायिक फैसलों के विश्लेषण के आधार पर तैयार किया गया है. इस अध्ययन में विभिन्न राज्यों की न्यायिक अकादमियों का सहयोग लिया गया, ताकि यह समझा जा सके कि यौन अपराधों से जुड़े मामलों में अदालतों की भाषा और न्यायिक दृष्टिकोण कितना संवेदनशील है.
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न्यायिक भाषा में संवेदनशीलता पर जोर
रिपोर्ट में सामने आया कि कई मामलों में पीड़ितों, गवाहों और अन्य कमजोर वर्गों के प्रति न्यायिक व्यवहार एक समान नहीं रहा. पैनल ने सुझाव दिया कि अदालतों में ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया जाना चाहिए, जो निष्पक्ष, सम्मानजनक और पूरी तरह तटस्थ हो. साथ ही यह भी कहा गया कि सुनवाई के दौरान जजों को ऐसे सवाल पूछने से बचना चाहिए, जो किसी तरह की रूढ़िवादी सोच को बढ़ावा दें या पीड़ित को ही कटघरे में खड़ा करते हों.
रिपोर्ट में यह भी सिफारिश की गई है कि यौन अपराध के मामलों में पीड़ित को किसी भी परिस्थिति में आरोपी के साथ बातचीत करने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए.
अध्ययन में बेहोश महिलाओं के साथ हुए कथित यौन उत्पीड़न के मामलों को लेकर भी चिंता व्यक्त की गई है. रिपोर्ट के अनुसार, कुछ मामलों में न्यायिक टिप्पणियों ने अनजाने में बलात्कार से जुड़े पुराने मिथकों को बढ़ावा दिया. इसमें आरोपी के कथित कृत्य की बजाय पीड़िता की विश्वसनीयता पर अधिक सवाल उठाए गए, जिसे न्याय प्रक्रिया के लिए चिंताजनक माना गया है.
इन शब्दों के इस्तेमाल से भी बचने की सलाह
रिपोर्ट में अदालतों को यह भी सुझाव दिया गया है कि फैसलों और न्यायिक टिप्पणियों में ‘बेचारी या बेबस नाबालिग लड़की’, ‘हवस से प्रेरित’, ‘अपनी नाजायज हवस पूरी करना’, ‘बचपन बर्बाद कर दिया’, ‘जिंदगी तबाह कर दी’ या ‘पूरी जिंदगी परेशान कर दिया’ जैसे भावनात्मक और पूर्वाग्रह पैदा करने वाले शब्दों का प्रयोग न किया जाए.
रिपोर्ट के अनुसार, ‘सम्मान’, ‘शर्म’, ‘पवित्रता’, ‘संकोच’ और ‘शुद्धता’ जैसे शब्द ऐसी सामाजिक सोच को दर्शाते हैं, जो महिलाओं की पहचान और गरिमा को उनकी यौन पवित्रता या परिवार की प्रतिष्ठा से जोड़कर देखती है. समिति का कहना है कि अदालतों को इन अवधारणाओं के बजाय सहमति (कंसेंट), गरिमा, शारीरिक स्वायत्तता और संवैधानिक अधिकारों को आधार बनाकर न्यायिक टिप्पणी करनी चाहिए.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि यौन अपराध को केवल ‘हवस’ का परिणाम बताने से यह गलत संदेश जा सकता है कि पुरुषों की यौन इच्छा पर उनका नियंत्रण नहीं होता, जिससे अपराध की गंभीरता कम करके आंकी जा सकती है. इसलिए अदालतों को ‘यौन हमला’, ‘यौन हिंसा’ या ‘यौन अपराध’ जैसे कानूनी रूप से उपयुक्त और सटीक शब्दों का इस्तेमाल करने की सलाह दी गई है.
समिति ने जजों को यह भी आगाह किया है कि केवल इस आधार पर कोई नकारात्मक निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए कि पीड़ित ने शिकायत दर्ज कराने में देरी की, उसके शरीर पर चोट के निशान नहीं मिले या उसने शारीरिक रूप से विरोध नहीं किया. रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि चोट का न होना, शिकायत में देरी या विरोध न करना किसी भी स्थिति में सहमति का प्रमाण नहीं माना जा सकता. पीड़ित अलग-अलग परिस्थितियों में अलग तरह से प्रतिक्रिया दे सकते हैं, इसलिए उनके व्यवहार को लेकर बनी-बनाई धारणाओं के आधार पर फैसला नहीं किया जाना चाहिए.
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