OBC क्रीमी लेयर पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, माता-पिता की सैलरी नहीं, पद से तय होगी पात्रता
Other Backward Classes: सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च को ‘यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रोहित नाथन’ मामले में OBC नॉन-क्रीमी लेयर के निर्धारण को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया था. इसमें अदालत ने स्पष्ट किया था कि क्रीमी लेयर का आधार केवल आर्थिक स्थिति नहीं, बल्कि माता-पिता का सामाजिक और प्रशासनिक दर्जा भी है.
अदालत ने यह भी साफ कर दिया कि उसका यह फैसला पिछली तारीख से लागू नहीं होगा. (Photo: ANI)
अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के आरक्षण से जुड़े क्रीमी लेयर के नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को बड़ा फैसला सुनाया. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की संशोधन याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि OBC क्रीमी लेयर का निर्धारण माता-पिता की केवल वेतन से होने वाली आय के आधार पर नहीं किया जा सकता. इसके लिए उनकी सेवा संबंधी स्थिति और सरकारी पद को ध्यान में रखना होगा. अदालत ने यह भी साफ कर दिया कि उसका यह फैसला पिछली तारीख से लागू नहीं होगा.
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सुप्रीम कोर्ट ने पुराना फैसला रखा बरकरार
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च को ‘यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रोहित नाथन’ मामले में OBC नॉन-क्रीमी लेयर के निर्धारण को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया था. इसमें सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि क्रीमी लेयर का आधार सिर्फ आर्थिक स्थिति नहीं, बल्कि माता-पिता का सामाजिक और प्रशासनिक दर्जा भी है. अब केंद्र सरकार की संशोधन याचिका खारिज होने के बाद अदालत ने अपने पहले के फैसले को बरकरार रखा है.
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि OBC आरक्षण के तहत सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के योग्य उम्मीदवारों को सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण का लाभ मिलता है. हालांकि, इस वर्ग के आर्थिक और सामाजिक रूप से उन्नत तबके को क्रीमी लेयर में रखा गया है. ऐसे उम्मीदवारों को OBC आरक्षण का लाभ नहीं मिलता.
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फिलहाल क्रीमी लेयर की आय सीमा सालाना 8 लाख रुपये निर्धारित है. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि इस सीमा की गणना में माता-पिता के वेतन और कृषि से होने वाली आय को सीधे शामिल नहीं किया जा सकता. माता-पिता किस पद पर कार्यरत हैं और उनकी सेवा की कैटेगरी क्या है, यह देखना जरूरी होगा.
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया था कि 11 मार्च के फैसले को पिछली तारीख से लागू करने के बजाय भविष्य से प्रभावी माना जाए. सरकार का तर्क था कि फैसले को पूर्वव्यापी प्रभाव देने से 2012 के बाद हुई सरकारी नियुक्तियों, IAS, IPS और IFS अधिकारियों के कैडर आवंटन तथा वरिष्ठता सूची पर असर पड़ सकता है. इससे ऐसे कर्मचारियों की स्थिति भी प्रभावित होती, जो इस मामले में पक्षकार नहीं हैं.