Supreme Court On Form 6 Modification: सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि उसने ‘फॉर्म 6 के किसी भी बदले हुए वर्जन को मंजूरी नहीं दी है’. फॉर्म 6 वो कानूनी दस्तावेज है जिसका इस्तेमाल वोटर लिस्ट में नए मतदाताओं को जोड़ने के लिए किया जाता है. चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्य कांत ने कहा कि कोर्ट सरकारी रिकॉर्ड की जांच करेगा ताकि ये पता लगाया जा सके कि बदलावों को किसने मंजूरी दी या लागू किया. ये क्लेरिफिकेशन चुनाव आयोग की एसआईआर एक्सरसाइज और इस प्रक्रिया के दौरान फॉर्म 6 से जुड़ी एक एडिशनल डिक्लेरेशन को लेकर चल रहे बड़े विवाद के बीच आया है.
फॉर्म 6 में बदलावों को लेकर मांगे रिकॉर्ड
सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने साफ किया कि सुप्रीम कोर्ट ने बदले हुए फॉर्म 6 को मंजूरी नहीं दी है. बेंच ने संकेत दिया कि वो ये तय करने से पहले संबंधित रिकॉर्ड की जांच करना चाहती है कि बदलाव कैसे लागू किए गए. ये मुद्दा तब अहम हो गया जब चुनाव आयोग ने पहले कहा था कि SIR प्रक्रिया के सिलसिले में फॉर्म 6 के साथ जोड़े गए एडिशनल डिक्लेरेशन को सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया था. विवाद इस बात पर है कि क्या चुनाव आयोग नियमों में औपचारिक बदलाव किए बिना किसी कानूनी फॉर्म में अतिरिक्त जरूरतें जोड़ सकता है.
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फॉर्म 6 का विवाद क्या है?
नए वोटर आवेदनों के लिए SIR प्रक्रिया के दौरान एडिशनल डिक्लेरेशन शुरू की गई थी. इस जरूरत के तहत आवेदकों से ऐसी जानकारी मांगी गई थी जो उन्हें या उनके माता-पिता या दादा-दादी/नाना-नानी को पिछली वोटर लिस्ट से जोड़ती हो. चुनाव आयोग ने उन राज्यों में फॉर्म 6 से SIR से जुड़ी घोषणा हटा दी है जहां रिविजन प्रक्रिया पूरी हो चुकी है. उसने ये भी कहा है कि SIR से जुड़ी प्रक्रियाओं के बाहर सामान्य कानूनी फॉर्म 6 लागू रहेगा.
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SIR के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?
27 मई 2026 के अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में SIR कराने के चुनाव आयोग के अधिकार को माना और उसे दस्तावेजों की जरूरतों को तय करने में कुछ छूट दी. हालांकि अदालत ने यह भी साफ किया कि ऐसा अधिकार असीमित नहीं था और कानूनी ढांचे से किसी भी तरह के अलग कदम का रिविजन प्रॉसेस के मकसद से रैशनल कनेक्शन होना चाहिए. इसलिए मौजूदा विवाद इस बात पर फोकस्ड है कि क्या एडिशनल डिक्लेरेशन उन लिमिट्स के भीतर थे.
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CEC के खिलाफ तुरंत कार्रवाई करने से इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने चीफ इलेक्शन कमिश्नर ज्ञानेश कुमार को सस्पेंड करने का अंतरिम आदेश देने से भी इनकार कर दिया. उन पर आरोप था कि कुछ फैसले दूसरे चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लिए गए थे. बेंच ने कहा कि इस तरह की राहत पर विचार करने से पहले वो संबंधित अधिकारियों से जवाब का इंतजार करेगी.
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