भारत में हाई-स्पीड इंटरनेट को देश के दूरदराज इलाकों तक पहुंचाने की दिशा में सैटेलाइट इंटरनेट को अगली बड़ी तकनीकी क्रांति माना जा रहा है. लंबे समय से इस सेवा का इंतजार किया जा रहा है और अब इसके व्यावसायिक स्तर पर शुरू होने की संभावनाएं तेज हो गई हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि आवश्यक सरकारी मंजूरियां, स्पेक्ट्रम आवंटन और तकनीकी तैयारियां पूरी होने के बाद आने वाले महीनों में आम उपभोक्ताओं के लिए सैटेलाइट इंटरनेट सेवाएं उपलब्ध कराई जा सकती हैं.
क्या है सैटेलाइट इंटरनेट?
सैटेलाइट इंटरनेट पारंपरिक मोबाइल टावर या फाइबर नेटवर्क पर निर्भर नहीं होता. इसके बजाय, पृथ्वी की निचली कक्षा (Low Earth Orbit) में स्थापित उपग्रहों के माध्यम से इंटरनेट कनेक्टिविटी उपलब्ध कराई जाती है. यही वजह है कि पहाड़ी क्षेत्रों, सीमावर्ती इलाकों, द्वीपों और उन गांवों में भी इंटरनेट पहुंचाया जा सकता है, जहां फाइबर केबल बिछाना या मोबाइल नेटवर्क स्थापित करना बेहद कठिन और महंगा होता है.
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कब तक उपलब्ध होगी सैटेलाइट इंटरनेट सेवा?
भारत में इस क्षेत्र में कई वैश्विक और घरेलू कंपनियां अपनी सेवाएं शुरू करने की तैयारी में हैं. हालांकि, सेवा शुरू होने का अंतिम समय सरकार से मिलने वाली मंजूरियों और लाइसेंस प्रक्रिया पर निर्भर करेगा. शुरुआती चरण में यह सेवा चुनिंदा क्षेत्रों में शुरू की जा सकती है, जिसके बाद धीरे-धीरे इसका विस्तार देशभर में किया जाएगा.
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गेटवे इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार होने, स्पेक्ट्रम आवंटन की प्रक्रिया पूरी होने और शर्तों का पालन किए जाने के बाद देश में सैटेलाइट इंटरनेट सेवा शुरू किए जाने की संभावना है. इस दिशा में जियो, एयरटेल समर्थित वनवेब और स्टारलिंक को सरकारी मंजूरियां मिल चुकी हैं. वहीं, ई-कॉमर्स दिग्गज अमेजन भी अपने प्रोजेक्ट कुइपर के जरिए भारतीय बाजार में उतरने की तैयारी कर रहा है और साल 2027-28 तक अपनी सेवाएं शुरू करने का लक्ष्य रखा है.
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सैटेलाइट इंटरनेट होगा महंगा?
शुरुआती दौर में सैटेलाइट इंटरनेट पारंपरिक ब्रॉडबैंड और मोबाइल डेटा की तुलना में महंगा हो सकता है. इसका प्रमुख कारण सैटेलाइट नेटवर्क तैयार करने, ग्राउंड स्टेशन विकसित करने और उपभोक्ताओं को विशेष रिसीवर उपकरण उपलब्ध कराने की लागत है. उपभोक्ताओं को सेवा शुरू करते समय डिश एंटीना या टर्मिनल डिवाइस खरीदना पड़ सकता है, जिसके लिए एकमुश्त खर्च भी करना होगा. हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे-जैसे इस क्षेत्र में कम्पटीशन बढ़ेगा और ग्राहकों की संख्या बढ़ेगी, डेटा प्लान की कीमतों में भी धीरे-धीरे कमी आने की संभावना है.
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सैटेलाइट इंटरनेट सेवा शुरू होने में क्यों हुई देर?
सैटेलाइट इंटरनेट परियोजना (Satellite Internet Project) के लॉन्च में सबसे बड़ी चुनौती स्पेक्ट्रम आवंटन की प्रक्रिया को लेकर बनी असहमति थी. इस मुद्दे पर टेलीकॉम कंपनियों के अलग-अलग मत सामने आए. रिलायंस जियो का पक्ष था कि सैटेलाइट स्पेक्ट्रम का वितरण नीलामी के जरिए किया जाए, जबकि स्टारलिंक प्रशासनिक आधार पर आवंटन की मांग कर रही थी. लंबे विचार-विमर्श के बाद केंद्र सरकार ने प्रशासनिक तरीके से स्पेक्ट्रम आवंटित करने का फैसला लिया. इस फैसले के बाद संबंधित कंपनियों के लिए अपनी व्यावसायिक तैयारियों को अंतिम रूप देने और सेवाएं शुरू करने का रास्ता काफी हद तक साफ हो गया है.
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सैटेलाइट इंटरनेट के लिए कितना खर्च करना पड़ सकता है?
सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं की कीमत अलग-अलग कंपनियों की रणनीति और टारगेटेड यूजर्स के आधार पर तय होगी. माना जा रहा है कि रिलायंस जियो आम उपभोक्ताओं को ध्यान में रखते हुए करीब 500 से 1,000 रुपये प्रतिमाह की कीमत वाले प्लान ला सकती है. इसके साथ ही ग्राहकों पर शुरुआती लागत कम रखने के लिए सैटेलाइट उपकरणों पर सब्सिडी देने की भी संभावना जताई जा रही है. कंपनी की योजना हर एक घर में अलग डिश लगाने के बजाय साझा सैटेलाइट गेटवे और अपने एयरफाइबर नेटवर्क के जरिए पूरे गांव या इलाके तक इंटरनेट पहुंचाने की है.
दूसरी ओर, एलन मस्क की स्टारलिंक शुरुआती चरण में प्रीमियम और दूरदराज के क्षेत्रों के ग्राहकों पर अधिक फोकस कर सकती है. इस सेवा का लाभ लेने के लिए उपभोक्ताओं को लगभग 30,000 से 34,000 रुपये का रिसीवर हार्डवेयर खरीदना पड़ सकता है. वहीं, मासिक अनलिमिटेड प्लान की संभावित कीमत 3,000 से 4,200 रुपये के बीच रहने का अनुमान है. बाजार में प्रवेश के दौरान कंपनी ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए सीमित अवधि के प्रमोशनल ऑफर और मुफ्त ट्रायल जैसी सुविधाएं भी ला सकती है.
वहीं, एयरटेल समर्थित वनवेब की रणनीति अन्य कंपनियों से अलग होगी. कंपनी का प्राथमिक फोकस घरेलू उपभोक्ताओं की बजाय कॉर्पोरेट संस्थानों, सरकारी विभागों, रक्षा क्षेत्र, विमानन, शिपिंग और बैंकिंग जैसे सेक्टरों को सैटेलाइट कनेक्टिविटी उपलब्ध कराने पर रहेगा.