हरियाणा के पंचकूला स्कूल कांड के 8 साल के आरोपी को जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने जमानत पर रिहा करके माता-पिता के साथ घर भेजा दिया है. 8 साल के बच्चे ने 6 साल की बच्ची पर 28 अक्टूबर 2026 को स्कूल के अंदर बुरी तरह मारा-पीटा था. उसने बच्ची को धक्के मारे थे और जमीन पर पटका था. सिर पकड़कर बेंच पर दे मारा था. ईंट-पत्थरों और गमले से उस पर वार किए थे. इतना ही नहीं बच्ची बेहोश हो गई, तब भी वह बच्ची पर वार करता रहा था. बच्ची 3 दिन तक जिंदगी और मौत से जूझती रही. मामले में पुलिस ने प्रिंसिपल, 2 टीचर्स और चौकीदार के खिलाफ केस दर्ज किया है. प्रिंसिपल और दोनों टीचर्स को शिक्षा विभाग ने सस्पेंड किया है.
किन नियमों के तहत और क्यों मिली जमानत?
चंडीगढ़ में GMCH-32 में मेंटल मैपिंग टेस्ट में बच्चा अबनॉर्मल निकला. बावजूद इसके जुवेनाइल जस्टिस एक्ट 2015 की धारा 12 के तहत आरोपी बच्चे को जमानत दे दी गई, क्योंकि कानून के अनुसार गंभीर से गंभीर अपराध होने पर भी बच्चे या 18 साल से कम उम्र कम नाबालिग को जेल नहीं भेजा जाएगा. भारतीय कानून के अनुसार, बच्चों या नाबालिगों को कानूनी सजा देने की बजाय उसमें सुधार और काउंसलिंग पर जोर दिया जाना चाहिए, क्योंकि एक बच्चा अपराध के परिणामों को नहीं समझ सकता. बाल सुधार गृह में उसका मानसिक और सामाजिक विकास प्रभावित होगा, वहीं बच्चे का पुरान आपराधिक रिकॉर्ड भी नहीं है, इसलिए उसे जमानत दे दी गई.
आरोपी बच्चे को बोर्ड से जमानत कैसे मिली?
मिली जानकारी के अनुसार, आरोपी बच्चे के माता-पिता ने जुवेनाइल बोर्ड को लिखित में वादा किया वे बच्चे के व्यवहार, स्वभाव और सोच को बदलने की जिम्मेदारी उठाएंगे. वे उसे तब तक स्मार्टफोन या कोई और इलेक्ट्रॉनिक गैजेट नहीं देंगे, जब तक उसमें बदलाव नहीं आ जाता. बच्चे की साइकोलॉजिकल काउंसलिंग कराएंगे और जरूरत महसूस हुई तो उसका पूरा इलाज भी कराएंगे. जब भी बोर्ड या जांच अधिकारियों को जरूरत पड़ेगी, वे बच्चे को पेश करेंगे. GMCH-32 चंडीगढ़ की मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर जुवेनाइल बोर्ड ने आदेश दिया है कि पढ़ाई डिस्टर्ब किए बिना उसका इलाज और थेरेपी जारी रखी जाए, इसका पालन भी पूरी शिद्दत के साथ किया जाएगा.
जुवेनाइल जस्टिस एक्ट 2015 की विशेषताएं?
बता दें कि जुवेनाइल जस्टिस एक्ट मतलब किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम 2015 पूरे देश में लागू है. इस एक्ट के तहत 18 साल से कम उम्र का शख्स को बालक है. एक्ट के अनुसार, 2 प्रकार के बच्चे होते हैं, एक वो जिसने कानून तोड़ा हो या अपराध किया हो और दूसरा वो जिसे देखरेख और संरक्षण की जरूरत हो, जो अनाथ, शोषित या त्यागा हुआ हो. कानून तोड़ने वाले बच्चों के मामले की सुनवाई किशोर न्याय बोर्ड (जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड) करता है. हर जिले में यह बोर्ड गठित है और एक मजिस्ट्रेट, 2 सामाजिक कार्यकर्ता, जिसमें एक महिला हो, इसके सदस्य होते हैं. एक अध्यक्ष और 4 सदस्यों वाली बाल कल्याण समिति (CWC) संरक्षण और देखरेख की जरूरत वाले बच्चों के मामलों की सुनवाई करती है और अंतिम फैसला लेती है, जो सभी को मान्य होता है.
जुवेनाइल जस्टिस एक्ट में सजा के प्रावधान
जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत छोटा अपराध करने पर आरोपी को ज्यादा से ज्यादा 3 महीने की सजा हो सकती है. गंभीर अपराध करने पर 3 से 7 साल तक की सजा हो सकती है. हत्या या दुष्कर्म जैसा जघन्य अपराध करने पर 7 साल या इससे ज्यादा की सजा हो सकती है. एक्ट की धारा 74 के तहत अपराध करने वाले बच्चे की पहचान का खुलासा करना कानूनन जुर्म है. 18 साल से कम उम्र का बालक हत्या या दुष्कर्म जैसा जघन्य या संगीन अपराध करते तो आरोपी को सबसे पहले जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के सामने पेश किया जाता है. बोर्ड मनोवैज्ञानिकों और सामाजिक विशेषज्ञों की मदद से तय करता है कि क्या बच्चा उस अपराध के परिणामों को समझने की मानसिक और शारीरिक क्षमता रखता है, जो उसने किया है और अपराध किन हालातों में किया गया है?
अगर बोर्ड को लगता है कि बच्चे ने अपराध सोच-समझकर किया है तो बाल न्यायालय को उसका केस भेजा जाता है और वयस्क की तरह उसके खिलाफ केस चलाया जा सकता है. बाल न्यायालय फैसला करेगा कि आरोपी बच्चे के खिलाफ व्यस्क की तरह केस चलाया जाए या उसे सुधार गृह में भेजा जाएगा, लेकिन अगर व्यस्क की तरह केस चलेगा और आरोपी दोषी मिलेगा तो उसे सजा हो सकती है. लेकिन सजा के लिए भी नियम हैं कि बच्चे को मौत की सजा या जेल की सजा या उम्रकैद नहीं दी जा सकती. बल्कि 21 साल की उम्र होने तक उसे ‘प्लेस ऑफ सेफ्टी’ (सुधार गृह) में रखा जाएगा. 21 साल का होने पर बाल न्यायालय उसके व्यवहार का मूल्यांकन करेगी और अगर उसमें सुधार या बदलाव हुआ तो उसे रिहा किया जा सकता है या सजा काटने के लिए जेल भेजा जा सकता है.