देश के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान महाराष्ट्र के पुणे में स्थित पुणे पब्लिक पॉलिसी फेस्टिवल में शामिल हुए. इस दौरान उन्होंने पड़ोसी देश पाकिस्तान को लेकर कई चौंकाने वाले खुलासे किए. भारत में प्रस्तावित संयुक्त थिएटर कमांड्स की प्रगति पर चर्चा करते हुए चौहान ने शुक्रवार को बताया कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने पाकिस्तान को संवैधानिक संशोधन करने पर मजबूर किया, जो इस बात की पुष्टि है कि पड़ोसी देश के लिए चीजें ठीक नहीं रहीं.
उन्होंने आगे कहा कि केंद्र सरकार ने इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए 30 मई 2026 तक का समय बढ़ा दिया है, लेकिन सेना इससे पहले ही ढांचा तैयार करने की कोशिश कर रही है. जनरल चौहान ने इसे अपनी अहम जिम्मेदारी बताया और कहा कि प्रक्रिया अब अंतिम चरण में है.
पुणे पब्लिक पॉलिसी फेस्टिवल में सीडीएस ने कहा कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ फिलहाल रुका हुआ है. उन्होंने कहा, ‘पाकिस्तान में जो बदलाव हुए हैं, खासकर जल्दबाजी में किया गया संवैधानिक संशोधन, असल में ये मानना है कि इस ऑपरेशन में उनके लिए सब कुछ ठीक नहीं रहा. उन्हें कई कमियां और कमजोरियां मिलीं.’
जनरल ने बताया कि ये संशोधन असल में फेडरल कस्टम्स कोर्ट्स के गठन से जुड़ा हुआ है, जो एक अलग मामला है. पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 243 में संशोधन से वहां की उच्च रक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव आया है.
उन्होंने कहा, ‘ये बदलाव भारत और खासकर हमारी सेना के लिए बहुत अहम हैं. अगर इन बदलावों को देखें तो पहला है चेयरमैन, जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी का पद खत्म करना, जो तीनों सेनाओं में तालमेल बढ़ाने के लिए बनाया गया था. अब उसकी जगह चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज (सीडीएफ) का पद बनाया गया है. लेकिन पाकिस्तान ने कहा है कि ये पद सिर्फ आर्मी चीफ ही बना सकते हैं, जो संयुक्तता के मूल सिद्धांत के खिलाफ है.’
सीडीएस ने बताया, ‘ये एक बड़ा बदलाव है. दूसरा बदलाव है नेशनल स्ट्रैटेजी कमांड का गठन. इस मोर्चे पर शायद उनके हिसाब से चीजें ठीक चलें. पहले उन्होंने आर्मी रॉकेट फोर्सेज कमांड भी बनाई थी. पारंपरिक और रणनीतिक नजरिए से ये उनकी ताकत बढ़ा सकता है. असल में उन्होंने नई संरचनाएं बनाकर ताकत केंद्रित की है.’
उन्होंने पाकिस्तान में हुए बदलावों पर कहा, ‘अब आर्मी चीफ जमीन पर ऑपरेशन्स, नेवी और एयरफोर्स के साथ संयुक्त ऑपरेशन्स सीडीएफ के जरिए और रणनीतिक व परमाणु मामलों के लिए जिम्मेदार होंगे. रॉकेट फोर्सेज कमांड का गठन एक और अहम स्तर जोड़ता है. ये कहीं न कहीं जमीन केंद्रित सोच को दिखाता है.’
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