Meet Pawan Kumar Chandana Naga Bharath Daka: भारत की निजी अंतरिक्ष क्रांति को नई ऊंचाइयों पर ले जाने का असली श्रेय ISRO के उन पूर्व वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को जाता है, जिन्होंने इसरो छोड़ने के बाद हैदराबाद में ‘स्काईरूट एयरोस्पेस’ नाम से एक स्टार्टअप शुरू किया था. आज महज 8 साल के भीतर यह स्टार्टअप 10,000 करोड़ रुपये (लगभग 1.2 बिलियन डॉलर) की वैल्यूएशन के साथ भारत की पहली प्राइवेट स्पेस-टेक यूनिकॉर्न कंपनी बन चुका है. स्काईरूट एयरोस्पेस के सह-संस्थापक पवन कुमार चंदना और नागा भारत डाका जैसे पूर्व इसरो वैज्ञानिकों ने ही देश के पहले निजी ऑर्बिटल-क्लास रॉकेट ‘विक्रम-1’ को डिजाइन और विकसित किया है.
वर्ष 2020 में केंद्र सरकार द्वारा अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोले जाने और IN-SPACe (इन-स्पेस) नियामक संस्था के गठन के बाद, इन वैज्ञानिकों ने इसरो से मिले व्यावहारिक अनुभव, 3D-प्रिंटिंग तकनीक और कार्बन-कंपोजिट संरचना का उपयोग करके बेहद किफायती और ऑन-डिमांड सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल तैयार किए हैं, जो आज वैश्विक वाणिज्यिक बाजार में भारत का दबदबा बढ़ा रहे हैं.
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अंतरिक्ष के लिए शुरू होगी ‘उबर कैब’ जैसी सर्विस
एनडीटीवी से बातचीत के दौरान स्काईरूट के सीईओ पवन कुमार चंदना ने अपने बेहद अनोखे बिजनेस मॉडल के बारे में बताया. उन्होंने कहा, “हमारा मिशन अंतरिक्ष को हर किसी के लिए सुलभ बनाना है. स्काईरूट के रॉकेट अंतरिक्ष में जाने वाली कैब या उबर (Uber) की तरह काम करेंगे.”
अभी तक छोटे सैटेलाइट्स को अंतरिक्ष में भेजने के लिए बड़े सरकारी रॉकेट्स का इंतजार करना पड़ता था, जहां कई देशों के सैटेलाइट्स एक साथ भेजे जाते हैं, लेकिन स्काईरूट की यह सर्विस एक ‘प्राइवेट जेट’ की तरह होगी. कोई भी ग्राहक अपनी जरूरत के हिसाब से पूरा रॉकेट बुक कर सकता है, अपना समय और अपनी मनपसंद कक्षा खुद तय कर सकता है. आज दुनिया के 90 फीसदी से ज्यादा सैटेलाइट 500 किलोग्राम से कम वजन के होते हैं, इसलिए इस ‘कैब सर्विस’ की ग्लोबल मार्केट में भारी डिमांड है.
पूरी तरह ‘मेड इन इंडिया’ है विक्रम-1 रॉकेट
स्काईरूट एयरोस्पेस इससे पहले साल 2022 में ‘विक्रम-एस’ नाम का भारत का पहला प्राइवेट सब-ऑर्बिटल रॉकेट सफलतापूर्वक लॉन्च कर इतिहास रच चुकी है. अब कंपनी अपने बेहद आधुनिक और 7 मंजिला ऊंचे ‘विक्रम-1’ रॉकेट के पहले ऑर्बिटल लॉन्च (मिशन आगमन) की तैयारी में जुटी है.
इस रॉकेट की सबसे खास बात यह है कि इसका 90 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा पूरी तरह स्वदेशी है. इसे भारत के ही 400 से ज्यादा सप्लायर्स की मदद से तैयार किया गया है. 3D-प्रिंटेड इंजन और कार्बन कंपोजिट बॉडी से बना यह रॉकेट अंतरिक्ष में 300 से 350 किलोग्राम तक का वजन आसानी से ले जा सकता है. इसरो के इन पूर्व वैज्ञानिकों ने यह साबित कर दिया है कि भारत अब सिर्फ सरकारी स्तर पर ही नहीं, बल्कि प्राइवेट सेक्टर में भी दुनिया को स्पेस टेक्नोलॉजी के मामले में राह दिखाने के लिए पूरी तरह तैयार है.
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