जस्टिस यशवंत वर्मा के कैश कांड की संसदीय जांच समिति की रिपोर्ट बीते दिन लोकसभा में पेश की गई. रिपोर्ट में जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की सिफारिश की गई. कैश कांड में नाम आने के बाद 200 सांसदों ने यशवंत वर्मा को पद से हटाने की मांग की थी तो लोकसभा अध्यक्ष ने संसदीय जांच समिति बनाकर मामले की जांच कराई, जिसमें उन पर लगे आरोप सहीं साबित हुए. संसदीय कमेटी संसद के शीतकालीन सत्र में उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की सिफारिश कर सकती है तो आइए जानते हैं कि महाभियोग क्या है? कैसे लाया जाता है? महाभियोग से जज को हटाने की प्रक्रिया क्या है?
महाभियोग क्या है और कहां पेश किया जाता प्रस्ताव?
महाभियोग एक संवैधानिक प्रावधान है, जिसके जरिए देश में सर्वोच्च पदों पर बैठे लोगों को उनके पद से हटाया जा सकता है. उनका कार्यकाल पूरा होने से पहले पद से हटाया जा सकता है. संविधान का उल्लंघन करने, भ्रष्टाचार या गंभीर कदाचार के आरोप साबित होने पर संसद में महाभियोग प्रस्ताव पेश करके दोषी को उसके पद से हटा दिया जाता है. महाभियोग संसद के किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है. वहीं महाभियोग प्रस्ताव को दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से पास कराना जरूरी है, तभी दोषी को उसके पद से हटाया जा सकेगा.
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किस-किस के खिलाफ लाया जा सकता महाभियोग?
संविधान के अनुसार, संसद में महाभियोग प्रस्ताव पेश करके सिर्फ राष्ट्रपति, सुप्रीम कोर्ट-हाई कोर्ट के जजों, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ पेश किया जा सकता है. राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग लाने का प्रावधान संविधान के अनुच्छेद-61 के तहत किया गया है. वहीं संविधान के अनुच्छेद 124(4) और 124(5) के तहत महाभियोग लाकर सुप्रीम कोर्ट के जजों को पद से हटाया जा सकता है. संविधान के अनुच्छेद-218 के तहत महाभियोग लाकर हाई कोर्ट के जजों को पद से हटाया जा सकता है. प्रधानमंत्री, मंत्रियों या सांसदों को पद से हटाने के लिए महाभियोग नहीं, बल्कि अविश्वास प्रस्ताव पेश किया जाता है.
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जजों के खिलाफ महाभियोग कैसे पेश किया जाता?
संविधान के अनुच्छेद-218 के तहत हाई कोर्ट के जज को पद से हटाने के लिए महाभियोग प्रस्ताव लोकसभा या राज्यसभा किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है. वहीं महाभियोग प्रस्ताव को लोकसभा में पेश करने के लिए कम से कम 100 लोकसभा सांसदों या राज्यसभा में पेश करने के लिए कम से कम 50 राज्यसभा सांसदों का समर्थन प्राप्ता होना चाहिए. लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति के द्वारा स्वीकार किए जाने पर ही प्रस्ताव को आगे बढ़ाया जाएगा. महाभियोग प्रस्ताव में जज पर लगे आरोपों, कार्रवाई, जांच और सबूतों का रिकॉर्ड होता है.
लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा सभापति के द्वारा प्रस्ताव स्वीकार किए जाने के बाद न्यायाधीश (जांच) अधिनियम 1968 के तहत 3 सदस्यीय जांच समिति गठित की जाती है. इस समिति में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस, हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस और मशहूर कानून विशेषज्ञ शामिल होते हैं. यह समिति जज पर लगे आरोपों की जांच करती है. आरोपी जज को भी अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाता है. जज के वकील पेश होते हैं और आरोपी जज के खिलाफ भी वकील नियुक्त होता है.
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दोनों वकीलों के बीच बहस होती है और जांच पूरी होने पर रिपोर्ट उस सदन को सौंपी जाती है, जिसमें महाभियोग प्रस्ताव पेश किया जाता है. रिपोर्ट पर सदन में बहस-चर्चा होगी. फिर वोटिंग कराई जाएगी, जिसमें प्रस्ताव को पास होने के लिए दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत चाहिए. अगर प्रस्ताव पारित हो जाता है तो उसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है. राष्ट्रपति प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करके जज के पद से हटाने का आदेश दे देते हैं. इस तरह जज को पद से हटाने की संसदीय प्रक्रिया पूरी होती है.
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इन 2 जजों के खिलाफ भी पेश हुआ था महाभियोग
बता दें कि 1993 में सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस वी. रामास्वामी के खिलाफ महाभियोग लाया गया था. उन पर धन का दुरुपयोग करने के आरोप लगे थे और संसदीय जांच समिति ने भी उन्हें दोषी पाया था, लेकिन लोकसभा में मतदान के दौरान सांसदों के अनुपस्थित रहने के कारण प्रस्ताव पारित नहीं हो सका था. इसके अलावा 2011 में जस्टिस सौमित्र सेन के खिलाफ धन के गबन का आरोप साबित हुए थे. राज्यसभा ने उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पारित कर दिया था, लेकिन लोकसभा में प्रस्ताव आने से पहले ही सौमित्र ने इस्तीफा दे दिया था. इनके अलावा कई जजों के खिलाफ प्रस्ताव लाया गया, लेकिन कोई पारित नहीं हुआ.
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