केंद्रीय शिक्षा मंत्री पद से धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को लेकर एक बड़ा खुलासा सामने आया है. सूत्रों के अनुसार, सरकार के प्रतिनिधि जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह ने कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के साथ बातचीत के दौरान धर्मेंद्र प्रधान का मंत्रालय बदलने की पेशकश की थी. हालांकि, सीजेपी ने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया और केवल इस्तीफे की मांग पर अड़ी रही. जंतर-मंतर पर युवाओं के लंबे चले प्रदर्शन के दबाव में सरकार को आखिरकार यह मांग माननी पड़ी. पेपर लीक विवाद के बीच एनटीए में बड़े सुधार, 47 अफसरों की बर्खास्तगी और एंटी पेपर लीक बिल जैसे सख्त कदम उठाए गए.
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धर्मेंद्र प्रधान के भविष्य को लेकर चर्चा
शिक्षा मंत्री पद से हटने के बाद धर्मेंद्र प्रधान के भविष्य को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं. ओडिशा से आने वाले प्रधान बीजेपी के एक बेहद कद्दावर और रणनीतिकार नेता माने जाते हैं. उन्होंने हरियाणा विधानसभा चुनाव में बतौर प्रभारी हैट्रिक लगवाई थी. इससे पहले उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश तथा पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भी संगठन को मजबूत किया था. हालांकि, सरकार का कहना है कि किसी मंत्री का विभाग बदलना या पद से हटाना पूरी तरह प्रधानमंत्री का विशेषाधिकार होता है. इसके बावजूद, धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा बीजेपी और केंद्र सरकार के राजनीतिक इतिहास में एक बड़ा कदम माना जा रहा है.
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इस्तीफे के बाद संसद में पहला बयान
इस्तीफा देने के बाद सोमवार को जब धर्मेंद्र प्रधान संसद पहुंचे, तो एनडीए के सांसदों ने उनका मुस्कुराते हुए स्वागत किया. इस दौरान कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने उनसे मुलाकात कर सहानुभूति जताई, जिस पर प्रधान ने बेहद बेबाक अंदाज में जवाब दिया. उन्होंने कहा कि वे सड़क पर संघर्ष करने वाले नेता हैं, न कि एसी कमरे में बैठने वाले कार्यकर्ता. सांसदों के बीच चर्चा रही कि पहली बार किसी मंत्री ने बिना किसी सीधे आरोप के ही नैतिक आधार पर इस्तीफा दे दिया. धर्मेंद्र प्रधान की इस प्रतिक्रिया से साफ है कि वे आने वाले समय में नई चुनौतियों के लिए पूरी तरह तैयार हैं.
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