भारत की तीनों सेना के लिए स्वदेशी आर्म्स के निर्माण पर लगातार जोर दिया जा रहा है, क्योंकि रक्षा मंत्रालय का एक मात्र लक्ष्य साल 2047 तक देश की तीनों सेना को शत प्रतिशत आत्मनिर्भर बनाना है. एक समय ऐसा भी था जब भारतीय सेना को एक सुंई की भी जरूरत पड़ती थी तो उन्हें विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता था और आज दुनिया के आर्म्स मार्किट में मेक इन इंडिया के तहत बने आर्म्स की लगातार मांग बढ़ रही है. आपको बता दें कि फिलिपींस, इंडोनेशिया के बाद वियतनाम से भारत की एक बड़ी रक्षा डील होने जा रही है. इन तीन देशों के बाद अब भारत के सबसे अच्छे दोस्तो में शामिल आर्मेनिया ने भी मेक इन इंडिया से बने आर्म्स को खरीदने में अपनी दिलचस्पी दिखाई है. आर्मेनिया सिर्फ आर्म्स ही नहीं खरीदेगा बल्कि वो अपने देश में ही भारत की मदद से गाइडेड पिनाका रॉकेट और 155 मिमी आर्टिलरी गोलों का Local Production करने की तैयारी में है. इसके लिए 2 राउंड की बैठक भी दोनों देश के रक्षा मामलों के बड़े अधिकारियों के साथ हो चुकी है.
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क्या है आर्मेनिया का प्लान?
अजरबैजान के साथ हुए युद्ध के बाद आर्मेनिया लगातार अपने डिफेंस सेक्टर को मजबूर करने में लगा हुआ है. आपको बता दें कि जब आर्मेनिया का अजरबैजान के साथ युद्ध हुआ था, तब उस लड़ाई में आर्मेनिया ने DRDO का बनाया हुआ पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम का इस्तेमाल किया था. भारतीय रक्षा मंत्रालय के सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, आर्मेनिया भारत से अत्याधुनिक गाइडेड पिनाका रॉकेट खरीदने वाला पहला देश था. ये सौदा 2 हजार करोड़ रुपये का हुआ था. लेकिन अब आर्मेनिया भारत के स्वदेशी आर्म्स का प्रोडक्शन अपने ही देश मे करना चाहता है. क्योंकि अजरबैजान के साथ जारी तनाव और सुरक्षा स्थिति को देखते हुए आर्मेनिया अपनी रक्षा तैयारियों को पुख्ता करना चाहता है.
स्वदेशी उत्पादन के पीछे आर्मेनिया का मकसद
आर्मेनिया के इस फैसले के पीछे दो बड़े कारण माने जा रहे हैं. पहला, वह अपनी सप्लाई चेन को मजबूत बनाना चाहता है ताकि युद्ध के समय हथियारों की कमी न हो. दूसरा, वह पुराने रक्षा सहयोगियों पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है और भारत के साथ रणनीतिक रिश्तों को मजबूत करना चाहता है. हालांकि इस ड्रीम प्रोजेक्ट को पूरा करने के सामने कुछ बड़ी चुनौतियां भी हैं. सबसे बड़ा सवाल यह है कि भारत इस संवेदनशील रक्षा तकनीक का कितना हिस्सा ट्रांसफर करने के लिए तैयार होगा. इसके अलावा आर्मेनिया को अपने देश में रक्षा उत्पादन के लिए बड़ा निवेश और मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर भी तैयार करना होगा. वहीं काकेशस क्षेत्र की बदलती भू-राजनीतिक स्थिति भी इस प्रोजेक्ट के भविष्य को प्रभावित कर सकती है.
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