ईरान युद्ध के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव ने अब दुनिया के सामने सल्फर की सप्लाई का बड़ा संकट खड़ा कर दिया है. सल्फर एक ऐसा बुनियादी तत्व है जिसका इस्तेमाल खाद, बैटरी, केमिकल और यहां तक कि कंप्यूटर चिप बनाने में भी किया जाता है. दुनिया का करीब आधा समुद्री सल्फर व्यापार इसी रास्ते से होता है इसलिए यहां मची हलचल ने पूरी दुनिया की उत्पादन लाइनों को खतरे में डाल दिया है. 28 फरवरी से शुरू हुए इस ताजा संघर्ष के कारण अब तक हजारों कंपनियों की शिपमेंट प्रभावित हो चुकी है जिससे आने वाले दिनों में महंगाई बढ़ने का डर है.
क्यों जरूरी है यह तत्व?
सल्फर मुख्य रूप से तेल और गैस रिफाइनिंग के दौरान एक बाई-प्रोडक्ट के रूप में निकलता है और खाड़ी देश दुनिया के कुल निर्यात का 45 प्रतिशत हिस्सा संभालते हैं. इसकी सबसे ज्यादा मांग यानी करीब 60 प्रतिशत हिस्सा खाद बनाने में इस्तेमाल होता है जबकि बाकी का उपयोग सेमीकंडक्टर और बैटरी उद्योग में किया जाता है. अगर इसकी सप्लाई में कमी आती है तो खेती की पैदावार घटने और मोबाइल-लैपटॉप जैसे इलेक्ट्रॉनिक सामानों की कीमतों में भारी उछाल आने का खतरा पैदा हो जाएगा. यह संकट सीधा हमारी थाली और तकनीक दोनों पर असर डालता है.
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भारत की बढ़ती चिंताएं
भारत अपनी खाद जरूरतों के लिए सल्फर के आयात पर बहुत ज्यादा निर्भर है इसलिए होर्मुज में जारी रुकावट सीधे भारत की खाद्य सुरक्षा को चोट पहुंचा रही है. सल्फर महंगा होने से खाद बनाने की लागत बढ़ जाएगी जिससे या तो किसानों पर बोझ बढ़ेगा या सरकार को अपनी सब्सिडी का बजट बढ़ाना पड़ेगा. विशेषज्ञों का मानना है कि खाद की कमी का मतलब है फसल उत्पादन में गिरावट जो देश में खाने-पीने की चीजों की महंगाई को अनियंत्रित कर सकती है. केमिकल और मेटल सेक्टर की कंपनियां भी बढ़ती लागत के कारण अब अपनी उत्पादन क्षमता घटाने पर विचार कर रही हैं.
चीन ने भी बढ़ाया दबाव
सप्लाई में आ रही इस गिरावट को देखते हुए चीन ने मई महीने से सल्फ्यूरिक एसिड के निर्यात पर रोक लगाने के संकेत दे दिए हैं. चीन यह कदम अपनी खुद की बुवाई सीजन की जरूरतों को पूरा करने के लिए उठा रहा है जिससे वैश्विक बाजार में सल्फर की किल्लत और ज्यादा बढ़ जाएगी. इस बीच भारत सरकार ने किसानों को बचाने के लिए खरीफ सीजन की सब्सिडी में 12 प्रतिशत की बढ़ोतरी कर दी है ताकि उन पर बढ़ी हुई कीमतों का बोझ न पड़े. हालांकि अगर यह युद्ध लंबा खिंचता है तो सरकार के पास बढ़ी हुई कीमतें जनता पर डालने या भारी वित्तीय घाटा सहने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचेगा.
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