कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके के नेतृत्व में छात्रों ने अपने हक की लड़ाई जीती. पुलिस की लाठियां, गिरफ्तारी, धमकियां तक अभिजीत दीपके और छात्रों का मनोबल नहीं तोड़ पाई. धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद जहां पूरा देश अभिजीत दीपके की पीठ थपथपा रहे हैं. वहीं अभिजीत दीपके के माता-पिता की प्रतिक्रिया भी जानने लायक हैं. मीडिया ने जब अभिजीत के आंदोलन और जीत के बारे में उनसे बात की, खुलकर अपनी मनोस्थिति बताई, अपनी इच्छा का जिक्र भी किया.
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मां की बेटे को घर बुलाने की इच्छा
महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर में अपने घर पर अभिजीत दीपके के माता-पिता पत्रकारों के रूबरू हुए. अभिजीत की माता अनीता ने भावुक होते हुए कहा कि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद उनकी महीनों पुरानी चिंता राहत और खुशी में बदली. अब वे बेटे को घर आने को कहेंगी. अगर वह नहीं आए तो खुद दिल्ली जाकर उसे लेकर आएंगे. गले लगाएंगे, प्यार और आशीर्वाद देंगे और उसकी आरती उतारेंगे, क्योंकि पिछली बार उसने आम आदमी हूं कहकर आरती उतारने नहीं दी थी.
टेंशन में मोबाइल तक नहीं देखती थी
अनीता ने कहा कि अभिजीत की जीत से मैं बेहद खुश हूं. ईमानदारी की जीत हुई है, लेकिन देशभर के युवाओं ने उसका साथ दिया, तभी वह लड़ाई जीत पाया. जब अभिजीत ने अमेरिका से भारत आकर आंदोलन शुरू किया था तो बहुत टेंशन थी. रात को नींद भी नहीं आती थी. हर समय चिंता रहती थी. फोन देखने से भी डरने लगी थी कि कहीं कोई अनहोनी वाली खबर न मिल जाए. उससे बात करने की बजाय उसके दोस्तों को फोन करके उसके बारे में पूछती थी कि वह सुरक्षित है या नहीं.
पिता ने युवाओं का आभार जताया
दीपके के पिता भगवानराव दीपके ने कहा कि कल तक उनकी आंखों में टेंशन थी, लेकिन आज खुशी के आंसू हैं. अभिजीत के आंदोलन को सफल बनाने में देश के हजारों युवाओं ने अथक परिश्रम किया. पुलिस की लाठियां खाईं, आंसू गैस के गोले तक सहे, लेकिन हिम्मत नहीं हारी. अभिजीत राजनीतिक बैकग्राउंड से नहीं है, फिर भी उसने राजनीति की राह चुनी. वह मेरी इच्छा के खिलाफ राजनीति में गया. गिरफ्तारी के डर से दीपके को सख्त हिदायत दी थी कि वह अमेरिका से भारत न लौटे.
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घर छोड़कर कोंकण रहने चले गए
उन्होंने कहा कि अभिजीत का आंदोलन शुरू होने के बाद हम कोंकण में रहने चले गए थे. क्योंकि उन दिनों हमें अभिजीत को रोकने का दबाव था. हमें शारीरिक नुकसान पहुंचाने की धमकियां मिल रही थीं. उस समय के माहौल का असर हमारी हेल्थ पर पड़ने लगा था. न ठीक से खा पाते थे और न ही सो पाते थे. तबियत दिन-प्रतिदिन खराब होने लगी थी. संसद मार्च के दौरान जब अभिजीत पर हमला हुआ तो सांसें एक बार तो अटक गई थीं, ऐसा लगता जैसे हमने अभिजीत को हमेशा के लिए खो दिया.
उन्होंने कहा कि धर्मेंद्र प्रधान ने पद छोड़ते हुए छात्रों से अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करने के लिए कहकर बड़ा दिल दिखाया है. उनका इस्तीफा किसी की जीत या हार नहीं है. इतना बड़ा पद को छोड़ने के लिए बड़ा दिल और हिम्मत चाहिए. धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा देते समय भी छात्रों के हितों के बारे में सोचा.
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