Glaucoma Eye Disease: आंखों की ये बीमारी धीरे-धीरे छीन सकती है रोशनी, शुरुआत में पता भी नहीं चलता!
Eye Problem: क्या आप जानते हैं एक गंभीर बीमारी ऐसी है, जो किसी भी व्यक्ति कि आंखों की रोशनी छीन लेती है. इस बीमारी की सबसे खतरनाक बात ये है कि जो लोग इस बीमारी का शिकार हो जाते हैं, उन्हें शुरुआती दौर में किसी तरह के लक्षण दिखाई नहीं देते हैं, जिस कारण ये बीमारी व्यक्ति कि आंखों की रोशनी छीनने लगती है. आइए National Eye Institute से जानें क्या है ये बीमारी और किन लोगों को ज्यादा खतरा?
किस बीमारी में आंखों की रोशनी छिन जाती है? (Image: AI/Pexels)
आंख कुदरत द्वारा दी गई ऐसी नायाब चीज है, जिसकी वजह से हम इस खूबसूरत दुनिया को देख पाते हैं. इंसानों से लेकर जानवरों तक कुदरत ने ये तोहफा सभी को दिया है, हालांकि, कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिनकी आंखों की रोशनी चली जाती है या फिर जन्म से ही वह नेत्रहीन होते हैं. लेकिन नेत्रहीन लोगों की भी हमेशा चाह रहती है कि काश वह भी आंखों से देख पाते, अपनों को देख पाते, दुनिया की हरी-भरी खूबसूरती को देख पाते आदि. इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि आंखों का होना किसी बड़ी बात है. लेकिन दुनिया में ऐसी कई गंभीर बीमारियां हैं, जो शरीर के महत्वपूर्ण अंगों को सीधा प्रभावित करती हैं, जिनमें आंखों की एक बीमारी ‘ग्लूकोमा’ (Glaucoma) भी शामिल है. ये बीमारी इतनी खतरनाक है कि इसके कारण मरीजों की आंखों की रोशनी तक छिन जाती है. आइए जानते हैं क्या है ग्लूकोमा और किन लोगों में रहता है इसका सबसे ज्यादा खतरा?
NIH के NEI (National Eye Institute) के अनुसार, ग्लूकोमा आंखों की बीमारियों का एक समूह है, जो आंख के पिछले हिस्से में मौजूद ‘ऑप्टिक नर्व’ (optic nerve) को नुकसान पहुंचाकर व्यक्ति की देखने की क्षमता को छीन सकता है सकता है. इसके लक्षण इतने धीरे-धीरे शुरू हो सकते हैं कि शायद आपका ध्यान ही न जाए कि आपकी आंखों में ये असर डाल रहा है. आपको ग्लूकोमा है या नहीं, यह जानने का एकमात्र तरीका आंखों की जांच (Comprehensive Dilated Eye Exam) करवाना है. ऐसे में आप समझ गए होंगे की ये बीमारी कोई आम संक्रमण या फ्लू नहीं है, जिसे नजरअंदाज कर दिया जाए. ग्लूकोमा को लेकर लापरवाही जिंदगी बदल सकती है और आपको अंधेरे में छोड़ सकती है, जिसके बाद आपको बाकी की जिंदगी दूसरों के सहारे जीना पड़ सकता है.
कई प्रकार के होते हैं ग्लूकोमा डिजीज
NEI के अनुसार, ग्लूकोमा कोई एक बीमारी नहीं है, बल्कि इसके भी कई प्रकार होते हैं, जो आंखों की सेहत पर असर डालती है. अगर आप चाहते हैं कि आपकी आंखों की सेहत बनी रहे और ये गंभीर बीमारी आंखों की रोशनी न छीने, तो इसके प्रकार कितने होते हैं और वह कैसे आंखों पर असर डालते हैं, ये जानना भी जरूरी है. NEI के अनुसार, मुख्य रूप से ग्लूकोमा डिजीज के दो प्रकार होते हैं, प्राइमरी और सेकेंडरी ग्लूकोमा और इन दोनों में भी कई प्रकार होते हैं, जो आंखों की सेहत पर असर डालते हैं.
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प्राइमरी ग्लूकोमा
NEI के अनुसार, प्राइमरी ग्लूकोमा, ग्लूकोमा डिजीज का ऐसा प्रकार है, जो कुछ मेडिकल स्थितियों के कारण व्यक्ति को अपना शिकार बना सकती है और कई मामलों में इसके पीछे के कारण का भी पता नहीं चल पाता है. डॉक्टर जब इस समस्या के पीछे क्या कारण है, जिसका पता नहीं लगा पाता है, तो ऐसी स्थिति को प्राइमरी ग्लूकोमा कहा जाता है. इसके भी कई प्रकार होते हैं, जिसमें;
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ओपन-एंगल ग्लूकोमा- अमेरिका जैसे देशों में सबसे आम ओपन-एंगल ग्लूकोमा, जिसका अंदाजा आप ऐसे लगा सकते हैं कि 10 में से 9 लोग इसी प्रकार से पीड़ित हो जाते हैं. ओपन-एंगल ग्लूकोमा में कई लोगों को लक्षण नहीं दिखाई देते, जब तक उनकी आंखों की रोशनी नहीं छिन जाती है. वहीं कुछ लोगों को लक्षण महसूस भी हो सकते हैं. NEI के अनुसार, विशेषज्ञों को ठीक-ठीक नहीं पता कि ओपन-एंगल ग्लूकोमा किस कारण से होता है. माना जाता है कि समय के साथ, दबाव ऑप्टिक नर्व को नुकसान पहुंचाता है, जिससे नजर कमजोर होने लगती है.
नॉर्मल-टेंशन ग्लूकोमा- नॉर्मल-टेंशन ग्लूकोमा, ओपन-एंगल ग्लूकोमा का एक प्रकार है जो उन लोगों में होता है जिनकी आंखों का दबाव सामान्य रहता है. आपको नॉर्मल-टेंशन ग्लूकोमा होने का खतरा अधिक हो सकता है, अगर, आप जापानी के हैं, आपके परिवार में किसी को नॉर्मल-टेंशन ग्लूकोमा रहा हो, आपको दिल से जुड़ी कुछ समस्याएं हैं, जैसे कि दिल की धड़कन का अनियमित होना और आपका ब्लड प्रेशर कम रहता हो.
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एंगल-क्लोजर ग्लूकोमा- एंगल-क्लोजर ग्लूकोमा, जिसे नैरो-एंगल या एक्यूट ग्लूकोमा भी कहा जाता है, एक मेडिकल इमरजेंसी है. अगर आपको अचानक इनमें से कोई भी लक्षण महसूस हों, तो तुरंत डॉक्टर के पास जाएं या इमरजेंसी रूम में जाएं; आंखों में तेज दर्द, जी मिचलाना, आंखें लाल होना और धुंधला दिखाई देना आदि.
कंजेनिटल ग्लूकोमा- कंजेनिटल ग्लूकोमा में, बच्चे जन्म से ही अपनी आंखों में एक ऐसी समस्या के साथ पैदा होते हैं, जिससे आंख का फ्लूइड सामान्य रूप से बाहर नहीं निकल पाता.
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सेकेंडरी ग्लूकोमा
कभी-कभी ग्लूकोमा किसी अन्य मेडिकल स्थिति के कारण होता है, उसे सेकेंडरी ग्लूकोमा कहते हैं. मुख्य रूप से चोट, सर्जरी या दवा के साइड इफेक्ट के कारण बढ़ जाता है और ऑप्टिक नर्व को नुकसान पहुंचाता है.
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नियोवैस्कुलर ग्लूकोमा- नियोवैस्कुलर ग्लूकोमा तब होता है जब आंख में अतिरिक्त खून वाहिकाएं बन जाती हैं, जो आंख के उस हिस्से को ढक लेती हैं जहां से सामान्य रूप से तरल पदार्थ बाहर निकलता है. यह आमतौर पर किसी अन्य मेडिकल कंडीशन, जैसे कि डायबिटीज या हाई ब्लड प्रेशर के कारण हो सकती है.
पिगमेंटरी ग्लूकोमा- पिगमेंटरी ग्लूकोमा तब होता है जब आपकी आइरिस (आंख का रंगीन हिस्सा) से पिगमेंट (रंग) के कण अलग होकर आंख से तरल पदार्थ के बाहर निकलने के रास्ते को रोक देते हैं.
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एक्सफोलिएशन ग्लूकोमा- एक्सफोलिएशन ग्लूकोमा ओपन-एंगल ग्लूकोमा का एक प्रकार है. यह उन लोगों में होता है जिन्हें ‘एक्सफोलिएशन सिंड्रोम’ नामक स्थिति होती है. इस स्थिति में, आंख के कुछ हिस्सों पर किसी तरह का अतिरिक्त पदार्थ जमा हो जाता है, जिससे आंख के फ्लूइड का बाहर निकलना रुक जाता है.
यूविटिक ग्लूकोमा- यूवेइटिक ग्लूकोमा उन लोगों को हो सकता है जिन्हें यूवेइटिस है. ये एक ऐसी स्थिति जिसमें आंख में सूजन और जलन होती है. यूवेइटिस से पीड़ित हर 10 में से लगभग 2 लोगों को यूवेइटिक ग्लूकोमा हो जाता है.
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कैसे दिखते हैं ग्लूकोमा के लक्षण?
NEI के अनुसार, शुरुआत में, ग्लूकोमा के आमतौर पर कोई लक्षण नहीं दिखते. यही वजह है कि ग्लूकोमा से पीड़ित आधे लोगों को यह पता ही नहीं होता कि उन्हें यह बीमारी है. हालांकि, समय के साथ, नजर धीरे-धीरे कम हो सकती है, जिसकी शुरुआत अक्सर साइड (पेरिफेरल) विजन से होती है; खासकर मरीज के देखने का वह हिस्सा जो नाक के सबसे करीब होता है. चूंकि यह प्रक्रिया बहुत धीमी होती है, इसलिए कई लोग शुरुआत में यह समझ ही नहीं पाते कि उनकी देखने की क्षमता में बदलाव आ रहा है. लेकिन जैसे-जैसे बीमारी बढ़ती है, मरीज को महसूस होने लग सकता है कि उसकी नजर में कुछ न कुछ गड़बड़ी है, जैसे अगल-बगल की चीजें नहीं देख पाना. हालांकि, वक्त रहते इलाज नहीं मिले, तो मरीज की आंखों की रोशनी पूरी तरह छिन सकती है.
किन लोगों को सबसे ज्यादा खतरा? क्या इलाज संभव है
अब सवाल उठता है कि किन लोगों को इस बीमारी का सबसे ज्यादा खतरा रहता है? NEI के अनुसार, इस बीमारी का खतरा कुछ लोगों में ज्यादा हो सकता है, जिसमें वह लोग शामिल है, जिनके परिवार में पहले किसी को यह बीमारी रही हो. इसके अलावा 60 साल या फिर उससे ज्यादा उम्र वाले व्यक्ति में भी इसका खतरा बना रहता है. हालांकि, इस बीमारी के इलाज के लिए डॉक्टर कई तरह के ट्रीटमेंट का सहारा ले सकते हैं, जिसमें दवाओं, लेजर ट्रीटमेंट और सर्जरी से भी इस बीमारी को रोका जा सकता है. लेकिन यह तभी संभव है, जब वक्त रहते इलाज करा लिया जाए.