प्रदूषित हवा का दिमाग पर क्या असर पड़ता है? याददाश्त और सोचने की क्षमता से जुड़ी जानें ये हैरान करने वाली सच्चाई
Air Pollution on Brain Health: देश के कई शहरों में प्रदूषण का स्तर काफी बढ़ा हुआ है, जिसके कारण परिवार वालों की सुरक्षा का ख्याल रखना जरूरी हो गया है. लेकिन क्या आप जानते हैं ये वायु प्रदूषण का असर सिर्फ फेफड़ों पर नहीं बल्कि दिमाग की सेहत पर भी असर डालता है? आइए जानते हैं NIH की रिसर्च ने क्या पाया.
हवा में घुला प्रदूषण याददाश्त के लिए बन सकता है खतरा. (Image: AI)
खबर की मुख्य बातें:
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NIH के अनुसार, वायु प्रदूषण का डिमेंशिया और अल्जाइमर जैसी न्यूरोलॉजिकल बीमारियों से गहरा संबंध है.
प्रदूषित हवा के लंबे समय तक संपर्क में रहने से याददाश्त, सोचने और प्रतिक्रिया करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है.
वायु प्रदूषण डिप्रेशन जैसी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को भी बढ़ा सकता है, जिससे व्यक्ति के महसूस करने और सोचने के तरीके पर असर पड़ता है.
WHO के अनुसार, घर में HEPA फिल्टर वाले एयर प्यूरीफायर का उपयोग करना और बाहर निकलने से पहले AQI की जांच करना प्रदूषण से बचाव के कुछ प्रभावी तरीके हैं.
प्रदूषण का नाम आते ही सबसे पहले सांस लेने में परेशानी, खांसी और फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों का ख्याल आता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि प्रदूषित हवा का असर सिर्फ फेफड़ों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह आपके दिमाग की सेहत को भी प्रभावित कर सकती है? हमारा दिमाग शरीर का सबसे महत्वपूर्ण अंग है, जो याददाश्त, सोचने-समझने, फैसले लेने और भावनाओं व प्रतिक्रियाओं को कंट्रोल करने जैसे जरूरी काम करता है. ऐसे में दिमाग का स्वस्थ रहना बेहद जरूरी है. NIH के अनुसार, हवा में मौजूद प्रदूषित कणों के लंबे समय तक संपर्क में रहने से कई तरह की न्यूरोलॉजिकल और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का खतरा जुड़ा पाया गया है. NIH के अनुसार, वायु प्रदूषण और डिमेंशिया, अल्जाइमर जैसी बीमारियों के बीच मजबूत संबंध सामने आया है. आइए जानते हैं कि प्रदूषित हवा दिमाग को किस तरह प्रभावित कर सकती है.
याददाश्त और सोचने-समझने की क्षमता हो सकती है प्रभावित
प्रदूषित हवा का संबंध दिमाग की कार्यक्षमता से भी जुड़ा हुआ है. NIH द्वारा शोध में पाया गया है कि वायु प्रदूषण, खासकर हवा में मौजूद सूक्ष्म कणों का संपर्क डिमेंशिया (Dementia) जैसी न्यूरोलॉजिकल स्थितियों से जुड़ा हो सकता है. डिमेंशिया कोई एक बीमारी नहीं, बल्कि ऐसी कई स्थितियों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द है, जिनमें व्यक्ति की याद रखने, सोचने और प्रतिक्रिया करने की क्षमता धीरे-धीरे प्रभावित होने लगती है. इसका असर व्यक्ति की रोजमर्रा की जिंदगी पर भी पड़ सकता है. बता दें कि शुरुआत में इसके लक्षण हल्के हो सकते हैं, लेकिन समय के साथ व्यक्ति को सामान्य काम करने के लिए भी दूसरों की मदद की जरूरत पड़ सकती है.
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डिमेंशिया का खतरा
डिमेंशिया Dementia दिमाग से जुड़ी ऐसी स्थिति है, जिसमें याददाश्त, सोचने और सही फैसले लेने की क्षमता धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है. NIH के अनुसार, वायु प्रदूषण और डिमेंशिया के बीच मजबूत संबंध पाया गया है. डिमेंशिया के कई प्रकार होते हैं और अल्जाइमर रोग इसका सबसे आम प्रकार है. इस समस्या से पीड़ित व्यक्ति को कई बार जानी-पहचानी जगहों पर भी रास्ता याद रखने में परेशानी हो सकती है. इसके अलावा, वह एक ही सवाल बार-बार पूछ सकता है या रोजमर्रा के सामान्य काम करने में पहले से ज्यादा समय लगा सकता है. पैसे का हिसाब रखने, बिल भरने, पढ़ने-लिखने और बातचीत करने में भी परेशानी हो सकती है. कुछ लोगों के व्यवहार और सामाजिक गतिविधियों में भी बदलाव देखने को मिलते हैं. हालांकि, डिमेंशिया के लक्षण हर व्यक्ति में एक जैसे नहीं होते, प्रदूषण के संपर्क और डिमेंशिया के बीच संबंध को समझना जरूरी है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि प्रदूषण के संपर्क में आने वाला हर व्यक्ति इस बीमारी का शिकार हो जाएगा.
अल्जाइमर रोग का भी रहता है खतरा
NIH के अनुसार, अल्जाइमर एक ऐसी दिमागी बीमारी है, जो धीरे-धीरे व्यक्ति की याददाश्त और सोचने-समझने की क्षमता को नुकसान पहुंचाती है. इस बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को आगे चलकर रोजमर्रा के आम काम करने में भी परेशानी हो सकती है. यह बुजुर्गों में डिमेंशिया का सबसे आम कारण है. अल्जाइमर में दिमाग के अंदर कुछ खास तरह के बदलाव होते हैं, इसमें एमिलॉयड बीटा नाम के प्रोटीन के असामान्य समूह बनने लगते हैं, जिन्हें एमिलॉयड प्लाक कहा जाता है. इसके अलावा, टाउ नाम के प्रोटीन के रेशे उलझकर गांठ जैसी संरचनाएं बना सकते हैं, इन्हें टाउ टेंगल्स कहा जाता है. ये बदलाव दिमाग की कोशिकाओं के कामकाज को प्रभावित करते हैं.
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डिप्रेशन और मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है असर
वायु प्रदूषण का संबंध सिर्फ याददाश्त और दिमाग की कार्यक्षमता से ही नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य से भी जुड़ा हुआ है. NIH के अनुसार, प्रदूषित हवा और डिप्रेशन के बीच भी संबंध सामने आया है. डिप्रेशन एक गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्या है, जो व्यक्ति के महसूस करने, सोचने और रोजमर्रा के काम करने के तरीके को प्रभावित करती है. इससे पीड़ित व्यक्ति लंबे समय तक
उदास
निराश या चिड़चिड़ा महसूस कर सकता है.
इसके अलावा इसके लक्षणों में;
थकान
कमजोरी
नींद की परेशानी
भूख में बदलाव जैसे लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं.
कुछ लोगों को ध्यान लगाने, चीजें याद रखने और फैसले लेने में परेशानी होती है. कई बार बिना किसी स्पष्ट शारीरिक कारण के सिरदर्द, शरीर में दर्द और पाचन संबंधी समस्याएं भी हो सकती हैं.
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अभी उठाए सही कदम
WHO के अनुसार, कुछ सही कदम उठाकर परिवार के लोगों को प्रदूषण की मार से काफी हद तक बचाया जा सकता है.
एयर प्यूरीफायर का इस्तेमाल करें: घर में HEPA फिल्टर वाला एयर प्यूरीफायर लगाया जा सकता है. कमरे के आकार के अनुसार सही क्षमता वाला प्यूरीफायर चुनें और उसके फिल्टर समय पर बदलें.
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खिड़कियां और दरवाजे बंद रखें: जब बाहर प्रदूषण का स्तर ज्यादा हो, तब बाहरी हवा का घर में आना कम करने के लिए दरवाजे और खिड़कियां बंद रखें. उनके आसपास मौजूद खाली जगहों को सील करें.
गीले कपड़े से पोछा लगाएं: घर में सूखी झाड़ू लगाने से धूल के कण हवा में फैल सकते हैं. इसलिए गीले पोछे और कपड़े से सफाई करना बेहतर है.
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ओजोन बनाने वाले प्यूरीफायर से बचें: ऐसे एयर क्लीनर का इस्तेमाल न करें जो ओजोन पैदा करते हैं. इससे घर के अंदर प्रदूषण बढ़ सकता है.
धुएं से दूरी रखें: घर के अंदर धूम्रपान न करें और अगरबत्ती या अन्य धुआं पैदा करने वाली चीजों का इस्तेमाल सीमित रखें.
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AQI देखकर बनाएं प्लान: बाहर जाने से पहले अपने इलाके का एयर क्वालिटी इंडेक्स चेक करें और सरकारी दिशा-निर्देशों के अनुसार गतिविधियों की योजना बनाएं.
ट्रैफिक वाली जगहों से बचें: बच्चों और बुजुर्गों को ज्यादा वाहनों वाली सड़कों, निर्माण स्थलों और धुआं निकलने वाली जगहों से दूर रखें.
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साधारण मास्क से न करें बचाव की उम्मीद: कपड़े का मास्क, रूमाल या सामान्य डस्ट मास्क बारीक प्रदूषक कणों से पर्याप्त सुरक्षा नहीं देते.
मास्क का सही इस्तेमाल करें: जरूरी होने पर अच्छी क्वालिटी का N95 मास्क पहनें. यह PM2.5 जैसे छोटे कणों को फिल्टर करने में मदद कर सकता है. मास्क नाक और मुंह पर अच्छी तरह फिट होना चाहिए.