AIIMS ने निकाला कॉर्निया की कमी पूरी करने का रास्ता, इस Artificial Cornea से लौटेगी आंखों की रोशनी

Artificial Cornea: अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ने कॉर्निया की कमी को पूरा करने के लिए आर्टिफिशियल कॉर्निया का परीक्षण किया है. यह किन मरीजों के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है और किनके लिए नहीं, जानिए यहां.

Artificial Cornea

आंखों की रोशनी का नया रास्ता है आर्टिफिशियल कॉर्निया. AI Generated Image

विज्ञापन

Artificial Cornea Trial: किसी व्यक्ति की आंखों का कॉर्निया खराब होता है तो डोनर कॉर्निया की मदद से उसके आंखों की रोशनी लौटाई जाती है. लेकिन, अगर किसी को डोनर कॉर्निया ही ना मिले तो क्या होगा? मेडिकल टर्म में कॉर्निया खराब होने को कॉर्नियल ब्लाइंडनेस कहा जाता है. कॉर्नियल ब्लाइंडनेस का एकलौता उपचार अबतर कॉर्निया ट्रांसप्लांट था जिसके लिए डोनर की जरूरत होती है. इस दिक्कत को सुलझाने के लिए AIIMS ने एक नया तरीका खोज निकाला है. एम्स ने नया ट्रायल किया है. इस ट्रायल में देखा गया है कि आर्टिफिशियल कॉर्नियल की मदद से बिना डोनर के भी मरीज के आंखों की रोशनी लौटाई जा सकती है.

यह भी पढ़ें- अग्नाशय कैंसर के इलाज के लिए बनाई गई नई दवा, ट्रायल में हुई सफल, जानिए किन मरीजों को मिल सकेगा फायदा

Advertisment

क्या है आर्टिफिशियल कॉर्निया

देश में 34 हजार नागरिक डोनर कॉर्निया के अभाव में बिना आंखों की रोशनी के जीवन जीने को मजबूर हैं. ऐसे में आर्टिफिशियल कॉर्निया एक नई उम्मीद बनकर आया है. आर्टिफिशियल कॉर्निया तकनीक का नाम केराटोप्रोस्थेसिस है. यह डोनर टिशू नहीं है बल्कि विशेष प्रकार का एक उपकरण है. यह कृत्रिम उपकरण है जिसमें पारदर्शी ऑप्टिकल हिस्सा होता है. यह खराब कॉर्निया के कारण बंद हुए रोशनी के रास्ते को फिर खोलता है. इससे रोशनी आंखों के अंदर जा पाती है. रोशनी रेटिना तक पहुंचती है और वहां से ऑप्टिक नर्व के जरिए मस्तिष्क तक संकेत पहुंचते हैं. यह आर्टिफिशियल कॉर्निया ऑप्टिक नर्व को ठीक नहीं करता बल्कि कॉर्निया की जगह रोशनी के लिए नया रास्ता देता है.

किन मरीजों को आर्टिफिशियल कॉर्निया से मिलेगा फायदा

इस आर्टिफिशियल कॉर्निया से आंखों की रोशनी खो चुके ब्लाइंड मरीजों को फायदा नहीं मिलेगा. यह उन मरीजों के लिए है जिनमें कॉर्निया ट्रांसप्लांट संभव नहीं होता है या ट्रांसप्लांट सफल होने की संभावना कम होती है. आर्टिफिशियल कॉर्निया लगने के बाद अब तक उपचार पाए मरीजों की दृष्टि पहले की तुलना में बेहतर हुई है. लेकिन, इस आर्टिफिशियल कॉर्निया के साथ चुनौती यह है कि यह रोशनी लौटाने की गारंटी नहीं देता है. यह रेटिना, ऑप्टिक नर्व और आंखों की दूसरी संरचनाओं की स्थिति पर भी निर्भर करता है.

विज्ञापन

भारत में आर्टिफिशियल कॉर्निया की कीमत

भारत में इस आर्टिफिशियल कॉर्निया की कीमत 2 से 4 लाख रुपए बताई जा रही है. लेकिन, असल खर्च उपकरण, अस्पताल और मरीज की स्थिति पर निर्भर कर सकता है.

विज्ञापन

डोनेट की गई कॉर्निया के साथ भी आते हैं चैलेंजेस

डोनेट की गई कॉर्निया के साथ भी कई तरह के चैलेंजेस आते हैं, जैसे डोनर मिलना मुश्किल होता है, डोनेट की गई कॉर्निया को 10 से 14 दिनों तक ही प्रीजर्व किया जा सकता है और इस अवधि तक ट्रांसप्लांट हो जाना जरूरी होता है. बहुत से डोनेट किए गए कॉर्निया को मेडिकल कारणों के चलते हटाना पड़ता है. लो सेल काउंट, माइनर स्क्रैचेस या इंफेक्शंस जैसे HIV, हेपेटाइटिस या ब्लड कैंसर वाले कॉर्निया को ट्रांसप्लांट के लिए सुरक्षित नहीं माना जाता है. इस चलते हजारों पेशेंट्स कॉर्निया का इंतजार करते रह जाते हैं.

विज्ञापन

अस्वीकरण – इस खबर को सामान्य जानकारी के तौर पर लिखा गया है. अधिक जानकारी के लिए विशेषज्ञ की सलाह लें या चिकित्सक से परामर्श करें. न्यूज 24 किसी तरह का दावा नहीं करता है.

विज्ञापन


विज्ञापन

Get Breaking News First and Latest Updates from India and around the world on News24. Follow News24 on Facebook, Twitter.

First published on:

Read more: About our editorial guidelines and standards here.

लेख समाप्त

लेखक के बारे में

Seema Thakur

Seema Thakur

सीमा ठाकुर पत्रकारिता से पिछले 7 सालों से जुड़ी हैं. न्यूज24 में सीमा बतौर चीफ सब एडिटर काम कर रही हैं. सीमा हेल्थ और लाइफस्टाइल बीट पर लिखती हैं और कॉन्टेन्ट क्रिएशन के साथ ही टीम लीड की भूमिका भी निभा रही हैं. न्यूज24 में सीमा ने अपनी बीट से हटकर इलेक्शंस की स्टोरीज पर भी काम किया है. हेल्थ और लाइफस्टाइल से जुड़ी स्टडीज, लेटेस्ट न्यूज और एक्सपर्ट्स/डॉक्टर्स से बातचीत पर आधारित लेख लिखने में सीमा की मजबूत पकड़ है. सीमा हेल्थ की खबरों और लेटेस्ट अपडेट के लिए AIIMS, ICMR, WHO,  स्वास्थ्य मंत्रालय जैसे संस्थानों के विशेषज्ञों और डॉक्टरों के संपर्क में रहती हैं. अनुभव सीमा ने पत्रकारिता की शुरुआत दिल्ली प्रेस ग्रुप से की थी जहां वे सरिता, मुक्ता और गृहशोभा मैग्जीन में वुमेन ओरिएंटेड, सोशल, लाइफस्टाइल, हेल्थ और बॉलीवुड के अलावा पॉलिटकल आर्टिकल्स लिखती थीं. सीमा को प्रूफरीडिंग और एडिटिंग का भी खासा अनुभव है. प्रिंट में काम करने के दौरान सीमा की हिंदी भाषा में अच्छी पकड़ है. दिल्ली प्रेस के बाद सीमा डायमंड पब्लिशिंग हाउस से जुड़ी थीं जहां उन्होंने मैग्जीन और वेबसाइट दोनों के लिए काम किया. डायमंड पब्लिशिंग हाउस के बाद सीमा ने NDTV के साथ डिजिटल मीडिया में अपना करियर शुरू किया. NDTV में सीमा ने राइटर के साथ ही वीडियो प्रोड्यूसर, एंकर और पॉडकास्टर के तौर पर भी काम किया. लाइफस्टाइल वीडियोज और बॉलीवुड गोल्ड सीरीज को प्रोड्यूस और एंकर करने के साथ ही वे बॉलीवुड पॉडकास्ट किया करती थीं. वीडियो प्रोडक्शन में सीमा का इंटरेस्ट और पकड़ यहीं से आई है. शिक्षा सीमा ने दिल्ली विश्वविद्यालय के दीन दयाल उपाध्याय कॉलेज से बी.ए किया है. इसके बाद जामिया मिलिया इस्लामिया से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा किया. जामिया की पीजी डिप्लोमा इन जर्नलिज्म डिपार्टमेंट की मैग्जीन में सीमा स्टूडेंट एडिटर और अपने बैच की कॉन्टेंट हेड रह चुकी हैं.
... और पढ़ें
विज्ञापन
होम पेज पर वापस जाएँ