उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की सियासी बिसात अभी से बिछनी शुरू हो गई है. समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने रामपुर जेल पहुंचकर पार्टी के कद्दावर मुस्लिम नेता मोहम्मद आजम खान से मुलाकात की. चुनाव से कुछ महीने पहले हुई इस मुलाकात को केवल एक शिष्टाचार भेंट नहीं माना जा रहा. बल्कि इसके पीछे असदुद्दीन ओवैसी की पश्चिमी यूपी में सक्रियता, मुस्लिम वोट बैंक पर पकड़ और 2027 के विधानसभा चुनाव की मजबूत रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है.
अखिलेश यादव ने जेल में आजम खान से लंबी बातचीत की और बाहर आकर साफ मैसेज दिया कि रामपुर और उसके आसपास के सियासी फैसलों में आजम खान की बात आगे रखी जाएगी. अखिलेश यादव ने जेल में आजम खान के समर्थकों खासकर मुस्लिम समुदाय के लोगों को मैसेज देते हुए कहा कि ‘आजम थे, आजम हैं और आजम रहेंगे’ मुलाकात के बाद अखिलेश यादव ने साफ किया कि संगठन स्तर पर चुनावी तैयारियां शुरू हो चुकी हैं और आजम खान के सियासी रसूख को पूरी तवज्जो दी जाएगी.
इससे कुछ हफ्ते पहले आजम खान की पत्नी तंजीन फातिमा ने भी लखनऊ में अखिलेश यादव से मुलाकात की थी. इस मुलाकात के बाद से ही दोनों नेताओं के बीच बर्फ पिघलने के संकेत मिलने लगे थे.
क्यों जरूरी हुई मुलाकात?
सियासी जानकारों का मानना है कि अखिलेश यादव की यह पहल पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बदलते राजनीतिक समीकरणों को साधने की कोशिश है. एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी लगातार यूपी के मुस्लिम बहुल इलाकों में अपनी पार्टी का आधार मजबूत करने और स्वतंत्र मुस्लिम नेतृत्व खड़ा करने की बात कर रहे हैं. ऐसे में आजम खान की नाराजगी सपा के लिए पश्चिमी यूपी में नुकसानदेह साबित हो सकती थी.
18 अक्टूबर को रामपुर में ओवैसी ने एक रैली में सपा प्रमुख पर आरोप लगाया था कि वे सिर्फ यादवों का ख्याल रखते हैं, जबकि मुसलमानों का इस्तेमाल केवल वोट पाने के लिए करते हैं.
ओवैसी ने दावा किया कि अगर सैफई के किसी यादव को छह महीने के लिए जेल भेज दिया जाए, तो ‘भैया’ लखनऊ में सड़क जाम कर देंगे, क्योंकि ‘मेरा यादव, यादव है.’ उन्होंने कहा, ‘और अगर ‘अब्दुल’ जेल में है, तो ‘भैया’ उससे कहेंगे कि चिंता मत करो और जेल से बाहर आने के बाद उन्हें ही वोट देना.’
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में सपा नेता से हवाले से लिखा है, ‘ओवैसी फैक्टर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. अखिलेश को उम्मीद है कि मुस्लिम वोटर्स सपा-कांग्रेस गठबंधन के पक्ष में एकजुट होंगे. लेकिन अगर ओवैसी ने आजम के प्रति सहानुभूति का फायदा उठाया और मुस्लिम वोटों में सेंध लगाई, तो इससे रामपुर और पश्चिमी यूपी के आसपास के जिलों में भाजपा को फायदा होगा.’
क्या आजम फैक्टर अब भी असरदार?
हालांकि, पार्टी के भीतर इस बात को लेकर दो राय भी हैं. पार्टी के एक वरिष्ठ मुस्लिम नेता का कहना है कि 2027 के चुनाव में आजम परिवार का असर पहले जैसा नहीं रहेगा. वर्तमान में आजम खान और उनके बेटे अब्दुल्ला आजम दोषी साबित होने की वजह से सीधे चुनाव नहीं लड़ सकते. उनकी बीवी तंजीन फातिमा अकेले सक्रिय नहीं हो सकतीं और आजम अपने छोटे बेटे को राजनीति में नहीं लाना चाहते
हालांकि, पिछले पांच वर्षों में राज्य की राजनीति में आजम का प्रभाव काफी कम हो गया है. इस दौरान उन पर कई मामले दर्ज हुए, उन्हें कई बार दोषी ठहराया गया और जेल भी जाना पड़ा.
कांग्रेस के साथ सीट शेयरिंग की खींचतान और मुस्लिम मतों के बिखराव को रोकने के लिए अखिलेश ने आजम खान के प्रति नरमी दिखाकर यह साफ कर दिया है कि सपा अपने पुराने किले और पारंपरिक ‘एम-वाई’ समीकरण को किसी भी कीमत पर कमजोर नहीं होने देगी.
2022 के विधानसभा चुनाव में आजम खान दसवीं बार रामपुर सीट से विधायक बने थे. वहीं, उनके बेटे अब्दुल्ला आजम स्वार सीट से चुनाव जीते थे. इसके बाद आजम खान 2019 के हेट स्पीच के एक मामले में दोषी ठहरा दिए गए, जिसकी वजह से उनकी विधायकी चली गई. फिर दिसंबर 2022 में उनकी सीट पर हुए उपचुनाव में सपा ने आजाम खान के भरोसेमंद आसिम राजा को मैदान में उतारा. लेकिन भाजपा के आकाश सक्सेना के सामने वो जीत नहीं हासिल कर पाए.
इसके बाद मई 2023 के उपचुनाव में भाजपा की सहयोगी पार्टी ‘अपना दल (सोनेलाल)’ के उम्मीदवार शफीक अहमद अंसारी ने स्वार सीट पर जीत हासिल की. उन्होंने समाजवादी पार्टी की उम्मीदवार अनुराधा चौहान को हरा दिया. अब्दुल्ला के विधायक पद से अयोग्य घोषित होने के बाद यह सीट खाली हो गई थी. दोनों सीटें हारना आजम परिवार के लिए बड़ा झटका थीं.