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कोलकाता एयरपोर्ट के अंदर कैसे पहुंची 136 साल पुरानी मस्जिद? अब क्यों शिफ्ट करने को लेकर हो रहा विवाद

अब तक सामान्य दिनों में केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल द्वारा एयरपोर्ट के एंट्री गेट पर चेकिंग के बाद करीब 50 लोगों को नमाज अदा करने की इजाजत दी जाती थी. शुक्रवार के दिन यह संख्या बढ़कर 80 से अधिक हो जाती थी.

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पश्चिम बंगाल में शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली नई सरकार के गठन के बाद कोलकाता के नेताजी सुभाष चंद्र बोस इंटरनेशनल एयरपोर्ट के परिसर में स्थित ऐतिहासिक ‘बैंकरा मस्जिद’ को दूसरी जगह शिफ्ट करने के मुद्दे ने एक बार फिर जोर पकड़ लिया है. नागरिक उड्डयन सुरक्षा ब्यूरो के इनपुट्स के आधार पर राज्य सरकार ने संवेदनशील हाई-सिक्योरिटी जोन में प्रवेश पर पूरी तरह रोक लगा दी है.

सुरक्षा को लेकर बड़ा रेड अलर्ट

अब तक सामान्य दिनों में केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल द्वारा एयरपोर्ट के एंट्री गेट पर चेकिंग के बाद करीब 50 लोगों को नमाज अदा करने की इजाजत दी जाती थी. शुक्रवार के दिन यह संख्या बढ़कर 80 से अधिक हो जाती थी. नमाज पढ़ने वालों को केवल पहचान पत्र दिखाकर बस के जरिए मस्जिद तक ले जाया जाता था. लेकिन हाल ही में सुरक्षा एजेंसियों ने इस बात पर गंभीर आपत्ति जताई कि एयरपोर्ट जैसे अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्र में बिना अनिवार्य बायोमेट्रिक जांच और बैकग्राउंड वेरिफिकेशन के केवल पहचान पत्र के भरोसे नागरिकों को सीधे प्रवेश दिया जा रहा है, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा को बड़ा खतरा हो सकता है.

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कहां आ रही दिक्कत

यह विवाद सिर्फ सुरक्षा का नहीं बल्कि एयरपोर्ट के इंफ्रा से भी जुड़ा है. नियमों के मुताबिक किसी भी रनवे से किसी इमारत की कम से कम दूरी 240 मीटर होनी चाहिए, जबकि यह मस्जिद सेकेंडरी रनवे से महज 165 मीटर दूर उत्तर में है. इसके चलते एयरपोर्ट के दूसरे रनवे की लंबाई केवल 2,832 मीटर रह गई है, जबकि मुख्य रनवे 3,633 मीटर लंबा है. इसकी वजह से छोटे विमान तो इस रनवे का इस्तेमाल कर पा रहे है, लेकिन बड़े विमानों को मुख्य रनवे पर ही निर्भर रहना पड़ता है.

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एयरपोर्ट से भी 34 साल पुरानी है मस्जिद

ऐतिहासिक दस्तावेजों के मुताबिक, यह मस्जिद एयरपोर्ट के भीतर नहीं बनाई गई थी, बल्कि एयरपोर्ट इसके चारों तरफ बनाया गया था. 1890 के दशक में जब वहां एक गांव हुआ करता था, तब इस मस्जिद का निर्माण हुआ था. 1924 में अंग्रेजों ने यहां ‘दमदम एयरोड्रोम’ बनाया, फिर पांच साल बाद यहां पर बंगाल फ्लाइंग क्लब खोला गया. लेकिन मस्जिद और गांव को नहीं हटाया. 1950 और 60 के दशक में जब एयरपोर्ट का विस्तार हुआ, तो गांववालों को 6-7 किमी दूर बसा दिया गया, लेकिन एक आपसी समझौते के तहत मस्जिद को छुआ तक नहीं गया.

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लेखक के बारे में

Arif Khan

आरिफ खान मंसूरी न्यूज 24 में बतौर डिप्टी न्यूज एडिटर कार्यरत हैं. आरिफ को डिजिटल पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा अनुभव हैं. उन्होंने 2014, 2019 और 2024 के लगातार तीन लोकसभा चुनाव के अलावा पिछले 15 सालों में देशभर में हुए विधानसभा चुनावों की भी व्यापक कवरेज की है. न्यूज 24 से पहले उन्होंने देश के कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों के साथ काम किया है. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत राजस्थान पत्रिका से की थी, यहां देश, दुनिया और पॉलिटिक्स की खबरों पर काम किया. आरिफ ने इसके बाद इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप की हिंदी वेबसाइट जनसत्ता के साथ अपनी पारी शुरू की. इसके बाद उन्होंने हिंदुस्तान टाइम्स की हिंदी न्यूज वेबसाइट लाइवहिंदुस्तान ज्वाइन कर लिया. लाइवहिंदुस्तान.कॉम के बाद वह एनडीटीवी ग्रुप के साथ जुड़ गए. एनडीटीवी में करीब छह साल तक काम करने के बाद न्यूज24 के साथ जुड़ गए. न्यूज24 में भी होमपेज की जिम्मेदारी संभालते हैं. शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से कला संकाय में स्नातक और मास्टर ऑफ जर्नलिज्म की डिग्री हासिल की है. आरिफ देश, विदेश और राजनीति से जुड़ी खबरों के अलावा एक्सप्लेनर लिखने में भी माहिर हैं.
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