पश्चिम बंगाल में तीन दशक पुराने वामपंथ के अभेद्य किले को ढहाने वाली और लगातार तीन कार्यकालों से राज्य की सत्ता पर एकछत्र राज करने वाली ममता बनर्जी इस समय अपने राजनीतिक जीवन के सबसे बड़े आंतरिक संकट से जूझ रही हैं. राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है कि क्या बंगाल में भी ‘महाराष्ट्र मॉडल’ दोहराया जा रहा है, जहां कुछ साल पहले एकनाथ शिंदे और अजित पवार ने अपनी ही पार्टियों (शिवसेना और एनसीपी) में बड़ा तख्तापलट कर दिया था. लेकिन इस पूरी कहानी का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि बगावत की कमान किसी कद्दावर या वरिष्ठ नेता के हाथ में नहीं, बल्कि पहली बार विधायक बने ऋतब्रत बनर्जी के हाथों में है.
अब सवाल उठता है कि जिस पार्टी को हाल तक अजेय माना जा रहा था, उसमें पहली बार का एक विधायक चुनावी शिकस्त के महज कुछ ही हफ्तों के भीतर 60 विधायकों को ममता बनर्जी के खिलाफ कैसे लामबंद करने में कामयाब रहा?
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कैसे शुरू हुआ विवाद
इस पूरे संकट की पटकथा तब लिखी गई जब टीएमसी के भीतर विपक्ष के नेता (LoP) के तौर पर शोभनदेव चट्टोपाध्याय के नाम पर मुहर लगाने की तैयारी चल रही थी. विवाद तब भड़का जब दो विधायकों – संदीपन साहा और ऋतब्रत बनर्जी ने विधानसभा सचिवालय में एक आधिकारिक शिकायत दर्ज कराई. उनका आरोप था कि इस समर्थन पत्र में टीएमसी ने अपने ही विधायकों के फर्जी हस्ताक्षर किए हैं.
इस शिकायत के सामने आने के कुछ ही घंटों के भीतर, पार्टी ने त्वरित कार्रवाई करते हुए ऋतब्रत और संदीपन साहा को ‘पार्टी विरोधी गतिविधियों’ के आरोप में निष्कासित कर दिया.
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मीटिंग में नहीं पहुंचे विधायक
टीएमसी के लिए खतरे के संकेत पिछले कुछ दिनों से ही मिलने लगे थे. हाल ही में ममता बनर्जी के आवास पर बुलाई गई एक अहम बैठक में पार्टी के 80 में से 60 विधायकों ने दूरी बना ली थी. हद तो तब हो गई जब चुनाव में मिली हार के बाद ममता बनर्जी के पहले सड़क प्रदर्शन में महज आठ विधायक और छह सांसद ही शामिल हुए. इस सन्नाटे ने साफ कर दिया था कि पार्टी के भीतर कुछ बड़ा पक रहा है. आखिरकार बुधवार को इस विद्रोही गुट ने सीधे विधानसभा अध्यक्ष से मुलाकात की और ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता घोषित करने के लिए 60 विधायकों के हस्ताक्षरों की सूची सौंप दी. बुधवार को स्पीकर ने नेता विपक्ष के तौर पर ऋतब्रत बनर्जी के नाम को मंजूरी भी दे दी.
इस बगावत में क्या नया ट्विस्ट
महाराष्ट्र में जब एकनाथ शिंदे या अजित पवार ने बगावत की थी, तो उन्होंने उद्धव ठाकरे और शरद पवार के नेतृत्व को सीधे चुनौती दी थी. लेकिन बंगाल के इस खेल में एक अनोखा मोड़ देखने को मिला है. ऋतब्रत के नेतृत्व वाले इस गुट ने साफ किया है कि वे ममता बनर्जी के नेतृत्व को चुनौती नहीं दे रहे हैं. विद्रोही गुट के एक विधायक ने मीडिया से बात करते हुए कहा था कि हम ममता बनर्जी के नेतृत्व को चुनौती नहीं दे रहे हैं. हम पार्टी तोड़कर कोई अलग दल नहीं बना रहे हैं, बल्कि हम टीएमसी के झंडे के नीचे ही काम करेंगे.
लेकिन अब सवाल यह पैदा होता है कि जब ममता बनर्जी से दिक्कत नहीं है तो फिर ये बगावत किसके खिलाफ है.
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शिवसेना-NCP के संकट से यह कितना अलग?
महाराष्ट्र में शिवसेना या एनसीपी में विभाजन रातों-रात नहीं हुआ था. वहां महीनों तक असंतोष सुलगता रहा, जिसके पीछे एक मजबूत ‘विचारधारा’ की लड़ाई थी. शिवसेना के विधायकों ने आरोप लगाया था कि कांग्रेस-एनसीपी के साथ जाने से उनकी मूल ‘हिंदुत्व’ की विचारधारा कमजोर हो रही है. वैचारिक आधार होने के कारण ही आज भी कार्यकर्ताओं का एक बड़ा हिस्सा उद्धव या शरद पवार के साथ खड़ा है.
इसके उलट, तृणमूल कांग्रेस का जन्म कभी किसी विशिष्ट राजनीतिक विचारधारा के इर्द-गिर्द नहीं हुआ था. ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर इस दल को बनाया और सत्ता के प्रभाव से इसे सींचा. ऋतब्रत बनर्जी, जो खुद वामपंथ से निष्कासित होने के बाद केवल आठ साल पहले टीएमसी में आए थे, उनके पास कोई भारी जनाधार या वैचारिक पकड़ नहीं है.
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अभिषेक बनर्जी को लेकर गुस्सा
इस संकट के मूल में है टीएमसी नेताओं का अभिषेक बनर्जी के प्रति ऋतब्रत और दूसरे नेताओं का बढ़ता गुस्सा. नेताओं का आरोप है कि जब से अभिषेक बनर्जी ने I-PAC की मदद से पार्टी के अंदरूनी मामलों को चलाना शुरू किया, तब से जमीन से जुड़े नेताओं और खुद ममता बनर्जी का नियंत्रण कम होने लगा. अभिषेक के पास सत्ता की ताकत तो थी, लेकिन उनके पास कोई जमीनी मास-सपोर्ट या वरिष्ठ नेताओं के बीच विश्वसनीयता नहीं थी. यह वजह है कि चुनावी हार का ठीकरा सीधे अभिषेक बनर्जी के काम करने के तरीके पर फूटा.
गेंद ममता के पाले में
ऋतब्रत बनर्जी के इस कदम ने ममता बनर्जी को एक बेहद कठिन चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है. सारा दारोमदार ममता पर है कि वे अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी का साथ देती हैं या फिर 60 विधायकों वाले इस विद्रोही गुट की मांगों के आगे झुकती हैं.
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