जब भी आप किसी दुकान पर क्यूआर कोड (QR Code) स्कैन करके 50 या 500 रुपये ट्रांसफर करते हैं, तो न आपसे कोई फीस ली जाती है और न ही दुकानदार से. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस टेक्नोलॉजी, ऐप और बैंकिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का आप रोज इस्तेमाल करते हैं, उसे चलाने का अरबों रुपये का खर्च आखिर कौन उठा रहा है?

हाल ही में संसद में पेश हुए नए बदलावों के बाद एमडीआर (Merchant Discount Rate) और यूपीआई के खर्चों पर बहस फिर से शुरू हो गई है. आइए समझते हैं कि यूपीआई का फ्री मॉडल कैसे काम करता है और आने वाले दिनों में इसमें क्या बड़े बदलाव होने वाले हैं.

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एमडीआर (MDR) क्या होता है?

सरल शब्दों में कहें तो MDR (Merchant Discount Rate) वह सर्विस फीस या चार्ज है, जो कोई भी व्यापारी या दुकानदार डिजिटल/कार्ड पेमेंट स्वीकार करने के बदले बैंक या पेमेंट कंपनी को देता है. जब आप कार्ड स्वैप करते हैं, तो दुकानदार को 0.5% से लेकर 2% तक का एमडीआर देना पड़ता है. 1 जनवरी 2020 से सरकार ने आम यूपीआई ट्रांजैक्शन पर जीरो-एमडीआर (Zero-MDR) लागू कर रखा है. यानी व्यापारी या ग्राहक दोनों से कोई फीस नहीं ली जाती.

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जब यूपीआई फ्री है, तो इसका खर्च कौन उठाता है?
गूगल पे (Google Pay), फोनपे (PhonePe), पेटीएम (Paytm), एनपीसीआई (NPCI) और बैंक जो तकनीक, सुरक्षा और सर्वर मेंटेनेंस पर करोड़ों खर्च करते हैं, वह पैसा कहां से आता है? अब तक इसका खर्च बैंक, पेमेंट कंपनियां और सरकार से मिलने वाली इंसेंटिव सब्सिडी मिलकर उठा रहे थे. पेमेंट कंपनियां इस उम्मीद में यह खर्च झेल रही थीं कि बड़े कस्टमर बेस के दम पर वे आगे चलकर अन्य वित्तीय सेवाएं (जैसे लोन, इंश्योरेंस) बेचकर कमाई करेंगी.

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अब एमडीआर (MDR) पर चर्चा क्यों शुरू हुई है?
पेमेंट इंडस्ट्री का मानना है कि करोड़ों-अरबों के ट्रांजैक्शन को हमेशा फ्री में प्रोसेस करना टिकाऊ (Sustainable) नहीं है. संसदीय समिति की रिपोर्ट और नए कानूनों में बदलाव का प्रस्ताव दिया गया है कि बड़े कारोबारियों और बड़े पेमेंट्स पर मामूली एमडीआर लागू किया जाए. इससे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को यूपीआई पर चार्जेस तय करने की कानूनी शक्ति मिल सकती है.

क्या आपकी जेब पर कोई असर पड़ेगा?
बिल्कुल नहीं. यह प्रस्तावित शुल्क आम उपभोक्ताओं या छोटे किराना दुकानदारों के लिए नहीं है. 2000 रुपये से अधिक के बिजनेस-टू-मर्चेंट (P2M) ट्रांजैक्शन कुल वॉल्यूम का सिर्फ 4% हैं, लेकिन कुल वैल्यू (रुपयों) में इनकी हिस्सेदारी लगभग 70% है. अगर एमडीआर लागू भी होता है, तो वह केवल बड़े स्टोर्स या बिजनेस एंटिटीज से लिया जाएगा. आम जनता के लिए यूपीआई फ्री ही रहेगा.

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पेमेंट कंपनियों को कितना फायदा होगा?
रिसर्च फर्म बर्नस्टीन (Bernstein) और जेफरीज (Jefferies) के अनुमान के मुताबिक अगर बड़े मर्चेंट पेमेंट्स पर 0.15% से 0.30% का एमडीआर भी लागू होता है, तो पेमेंट इंडस्ट्री (Paytm, Pine Labs आदि) को सालाना 5,000 से 10,000 करोड़ रुपये का रेवेन्यू मिल सकता है. इससे फिनटेक कंपनियों के पास साइबर फ्रॉड रोकने और सुरक्षा मजबूत करने के लिए बेहतर फंड उपलब्ध होगा.

यूपीआई भारत की डिजिटल रीढ़ बन चुका है. इसे लंबे समय तक सुरक्षित और मजबूत बनाए रखने के लिए बड़े बिजनेस ट्रांजैक्शंस पर मामूली फीस लगाने की तैयारी है. अच्छी बात यह है कि आम नागरिक के लिए रोजाना का यूपीआई ट्रांजैक्शन पहले की तरह पूरी तरह फ्री और सुरक्षित रहेगा.