दुनिया में आज भी कई देशों के बीच अमेरिकी डॉलर में व्यापार होता है, इतिहास से ही वैश्विक अर्थव्यवस्था में अमेरिकी डॉलर का दबदबा अब तक रहा है, लेकिन आने वाले वर्षों में यह तस्वीर बदलती दिख सकती है. एक ताजा सर्वे में सामने आया है कि दुनियाभर के केंद्रीय बैंक पहली बार अपने विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर की हिस्सेदारी घटाने की योजना बना रहे हैं. यह सर्वे ऑफिशियल मॉनिटरी एंड फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस फोरम (OMFIF) द्वारा कराया गया है, और इसके नतीजे वैश्विक मुद्रा व्यवस्था में बड़े बदलाव की ओर इशारा कर रहे हैं.

अब तक दुनिया का अधिकतर कारोबार चाहे वह कच्चे तेल का आयात हो या किसी अन्य वस्तु का निर्यात, डॉलर के जरिए ही होता रहा है. यही वजह है कि डॉलर को सबसे भरोसेमंद और स्थिर मुद्रा माना जाता रहा है. लेकिन अब हालात धीरे-धीरे करवट ले रहे हैं. कई देश स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा दे रहे हैं और अमेरिका की दबाव वाली विदेश नीति को लेकर भी असंतोष बढ़ता दिख रहा है.

---विज्ञापन---

यह भी पढ़ें: महंगाई की मार! बढ़ सकते हैं दूध, दाल और सब्जियों के दाम, जानें मानसून कैसे बिगाड़ेगा किचन का बजट?

---विज्ञापन---

क्यों डॉलर के साथ हो सकता है खेला?


सर्वे के मुताबिक, केंद्रीय बैंकों को डॉलर को लेकर तीन प्रमुख जोखिम नजर आ रहे हैं. पहला, अमेरिका में राजनीतिक अस्थिरता, जिसने डॉलर की दीर्घकालिक मजबूती पर सवाल खड़े किए हैं. दूसरा, अमेरिका के विभिन्न देशों के साथ बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, जिसका असर डॉलर की कीमतों में उतार-चढ़ाव के रूप में देखा गया है, खासतौर पर हाल के ईरान संकट के दौरान.

---विज्ञापन---

डॉलर नहीं तो क्या होगा व्यापार का विकल्प


तीसरा बड़ा कारण है वैश्विक वित्तीय व्यवस्था का बहुध्रुवीय होना, यानी अब ज्यादातर देश सिर्फ एक मुद्रा पर निर्भर रहने के बजाय कई मुद्राओं में लेन-देन को प्राथमिकता दे रहे हैं. डॉलर के संभावित विकल्पों की बात करें तो सर्वे में सोना, यूरो, ब्रिटिश पाउंड, चीनी युआन, नॉर्वे की क्रोन और न्यूजीलैंड डॉलर को प्रमुखता दी गई है. हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यूरो और युआन की अपनी सीमाएं हैं, जिस वजह से वे अभी डॉलर का पूर्ण विकल्प नहीं बन पाए हैं.

---विज्ञापन---

यह भी पढ़ें: Railway New Rules: ट्रेन यात्रियों के लिए बड़ा झटका! इन गलतियों पर लगेगा ₹2500 से ₹10000 तक जुर्माना

---विज्ञापन---

भारत को कैसे होगा फायदा?


हालांकि रिपोर्ट यह भी स्पष्ट करती है कि डॉलर का वर्चस्व अचानक खत्म नहीं होने वाला. अंतरराष्ट्रीय व्यापार और सुरक्षित निवेश के तौर पर इसकी भूमिका अब भी मजबूत बनी हुई है. भारत के नजरिए से देखें तो यह सर्वे कई संभावनाएं खोलता है. डॉलर पर निर्भरता घटने से भारत वैश्विक व्यापार में रुपये के इस्तेमाल को बढ़ावा दे सकता है, साथ ही अपने विदेशी मुद्रा भंडार में सोने और अन्य मुद्राओं की हिस्सेदारी भी बढ़ा सकता है.