परिवार में जब अनबन या झगड़े बढ़ जाते हैं, तो कई बार स्थिति बहुत तनावपूर्ण हो जाती है. ऐसे में एक सवाल अक्सर पूछा जाता है कि क्या कोई मां अपने ही बनाए या खरीदे हुए घर से अपने बेटे और बहू को बेदखल कर सकती है? इसका सीधा और साफ जवाब है- हां, बिल्कुल कर सकती हैं. भारतीय कानून बुजुर्गों और माता-पिता को उनकी खुद की संपत्ति की सुरक्षा के लिए कई मजबूत अधिकार देता है. आइए, बिल्कुल आसान बोलचाल की भाषा में समझते हैं कि कानून में इसके लिए क्या प्रावधान हैं और बहू के क्या अधिकार हैं.
स्वयं-अर्जित संपत्ति (Self-Acquired Property) का नियम
गाजियाबाद कोर्ट की सीनियर एडवोकेट रेणु अग्रवाल के अनुसार अगर मकान पूरी तरह से मां की अपनी कमाई, पेंशन या बचत से खरीदा या बनवाया गया है, तो उस पर बच्चों का कोई जन्मसिद्ध अधिकार नहीं होता है. लिहाजा मां जब चाहें तब उस घर में रहने या न रहने का फैसला कर सकती हैं. वे चाहें तो अपनी संपत्ति किसी को भी बेच सकती हैं या वसीयत (Will) के जरिए किसी और के नाम कर सकती हैं.
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सीनियर सिटीजन एक्ट 2007 (Senior Citizens Act)
एडवोकेट रेणु कहती हैं कि भारत सरकार का माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 बुजुर्गों को मानसिक या शारीरिक प्रताड़ना से सुरक्षा देता है. अगर बेटा और बहू बुजुर्ग माता-पिता को परेशान करते हैं, उनका ख्याल नहीं रखते या घर पर अवैध कब्जा जमाकर बैठते हैं, तो माता-पिता मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल (Maintenance Tribunal) में जाकर घर खाली कराने का आदेश ले सकते हैं.
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कानूनी प्रक्रिया को मजबूत करने के लिए कई बार माता-पिता अखबार में इश्तिहार देकर यह भी घोषित कर देते हैं कि उनका उस बेटे और बहू से कोई संबंध नहीं है और वे उन्हें अपनी संपत्ति से बेदखल करते हैं.
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बहू के अधिकार और कानून के अपवाद
अक्सर यह भ्रम रहता है कि घरेलू हिंसा कानून (DV Act) के तहत बहू को ससुर या सास के घर से कभी नहीं निकाला जा सकता, लेकिन अदालत ने इसमें कुछ बातें साफ की हैं. एडवोकेट रेणु अग्रवाल के अनुसार अगर यह साबित हो जाता है कि संपत्ति पूरी तरह सास की अपनी है और बेटा-बहू मिलकर उन्हें प्रताड़ित कर रहे हैं, तो कोर्ट सास के हक में बेदखली का आदेश दे सकती है.
अगर बेटा और सास मिलकर साजिश के तहत बहू को निकालना चाहते हैं, तो अदालत पति को यह निर्देश दे सकती है कि वह अपनी पत्नी के रहने के लिए अलग मकान या किराये का इंतजाम करे.