Kundali Yog: ज्योतिष शास्त्र में मात्र ग्रहों की स्थिति से ही नहीं, बल्कि उनसे बनने वाले विशेष योगों से भी जीवन की गूढ़ घटनाओं का आंकलन होता है. इन्हीं में से एक है 'प्रेत बाधा' या नकारात्मक ऊर्जा के साये का योग. जब भी कुंडली में राहु, केतु, शनि या मंगल जैसे ग्रह मन का कारक चंद्रमा और शरीर के स्वामी लग्न को जकड़ लेते हैं, तो व्यक्ति अदृश्य शक्तियों का शिकार बनने लगता है. आइए जानते हैं, इनके लिए जिम्मेदार ग्रह, खास योग और उनके डरावने लक्षण.
राहु का भ्रमजाल
राहु को छाया ग्रह कहा जाता है और यह भटकाव, भ्रम तथा अतृप्त इच्छाओं का कारक है. जब यह कमजोर चंद्रमा के साथ बैठता है या लग्न में स्थित होकर शनि-मंगल की क्रूर दृष्टि से घिरता है, तब व्यक्ति की मानसिक दीवारें ढहने लगती हैं और उसे निरंतर अदृश्य हस्तक्षेप का आभास होता है.
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केतु की गुप्त छुरी
केतु को मोक्ष और गुप्त विद्याओं का कारक माना गया है, लेकिन इसकी पीड़ित अवस्था व्यक्ति को दूसरी दुनिया की ताकतों के समक्ष असहाय बना देती है. अष्टम या द्वादश भाव में बैठा केतु जब शनि या मंगल से दृष्ट होता है, तो यह 'पैशाचिक बाधा' का निर्माण करता है, जिससे जातक को हर वक्त कोई खींचने या छूने का एहसास होता है.
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शनि की जकड़न
शनि वायु तत्व का प्रतिनिधित्व करता है और जब इसकी नकारात्मक ऊर्जा राहु से टकराती है, तो मस्तिष्क की तंत्रिकाएं सीधे प्रभावित होती हैं. कुंडली में कहीं भी शनि और राहु की युति 'श्रापित दोष' या 'प्रेत श्राप योग' रचती है, जो नींद में चलने, डरावने स्वप्न और व्यक्तित्व में एकदम बदलाव की जड़ बनती है.
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मंगल की आक्रामकता
मंगल जब राहु या केतु के साथ मिलकर लग्न, पंचम या नवम भाव में बैठता है, तो यह व्यक्ति के भीतर हिंसक ऊर्जा भर देता है. यह योग मानसिक संतुलन को बिगाड़कर जातक को ऐसे काम करने पर विवश कर देता है, जो उसके वास्तविक स्वभाव में होते ही नहीं.
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पिशाच योग
यह सबसे खतरनाक योग तब बनता है जब प्रथम भाव में चंद्रमा और राहु एक साथ बैठे हों और उन पर पांचवें व नवम भाव से शनि या मंगल जैसे पाप ग्रहों की दृष्टि पड़ रही हो. इस योग में जातक को अकारण भय, अंधेरे में किसी की उपस्थिति और शारीरिक दबाव के संकेत स्पष्ट दिखने लगते हैं.
गुरु-चांडाल दोष
जब ज्ञान का कारक बृहस्पति राहु के साथ बैठता है, तो सही-गलत की पहचान खत्म हो जाती है. यह योग व्यक्ति की धार्मिक आस्था को भी नकारात्मकता की ओर मोड़ सकता है और उसे हिंसक मानसिकता का शिकार बना सकता है.
अष्टम-द्वादश का खेल
यदि राहु, केतु या शनि पीड़ित अवस्था में अष्टम भाव या द्वादश भाव में स्थित हों, तो यह स्थिति गुप्त शक्तियों के संपर्क का रास्ता खोलती है. ऐसे में व्यक्ति को अजीबोगरीब गंध आना या कानों में फुसफुसाहट सुनाई देना आम हो जाता है.
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सप्तम-षष्ठ भाव का योग
सप्तम भाव में शनि, राहु, केतु या मंगल का पीड़ित होना और षष्ठ भाव में पाप ग्रहों से युक्त राहु-केतु का होना, दोनों ही स्थितियां ऊपरी बाधा को न्योता देती हैं. इन योगों में चिकित्सकीय जांचें सामान्य आती हैं, लेकिन दवाओं का कोई असर नहीं दिखता, जो इस बाधा की सबसे बड़ी पहचान है.
चंद्र-राहु या केतु योग
चंद्रमा का राहु या केतु के साथ होना मन को भ्रमित कर देता है, जिससे हर समय कोई घूरने, पीछा करने या शरीर पर दबाव पड़ने का अहसास बना रहता है.
यदि लग्नेश नीच हो
यदि लग्न का स्वामी नीच राशि में राहु के साथ बैठा हो और उस पर सूर्य, शनि व अष्टमेश की दृष्टि पड़े, तो 'प्रेत अरिष्ट योग' बनता है, जो व्यक्ति की अपनी पहचान मिटाकर उसे अदृश्य सत्ताओं के वश में कर सकता है.
रचनात्मक क्षेत्र से जुड़े लोगों को विशेष सफलता मिलने के संकेत दिखाई दे रहे हैं.
डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी ज्योतिष मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है. News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है.