अमेरिका और ईरान के बीच आज जो भीषण युद्ध जैसे हालात बने हैं, उसकी असली वजह 11 साल पुराने परमाणु विवाद में छिपी है. साल 2015 में दुनिया की महाशक्तियों और ईरान के बीच एक ऐतिहासिक समझौता हुआ था, जिसे जेसीपीओए (JCPOA) कहा जाता है. इस डील का मुख्य मकसद ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने से रोकना था. इसके बदले में ईरान को अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग और तेल व्यापार में वापसी का मौका दिया गया और उस पर लगे अरबों डॉलर के कड़े प्रतिबंधों में राहत दी गई थी. इस समझौते के तहत ईरान ने अपने यूरेनियम संवर्धन (एनरिचमेंट) के स्तर को सीमित करने और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) को जांच की अनुमति देने पर सहमति जताई थी.
ट्रंप का फैसला और समझौते का बिखरना
साल 2018 में डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व वाले अमेरिकी प्रशासन ने इस समझौते को पूरी दुनिया के लिए खतरनाक बताते हुए इससे हाथ खींच लिए थे. अमेरिका के अलग होने के बाद ईरान पर पहले से भी ज्यादा सख्त आर्थिक पाबंदियां लगा दी गईं. इसका नतीजा यह हुआ कि ईरान ने भी समझौते की शर्तों को धीरे-धीरे नजरअंदाज करना शुरू कर दिया. ईरान ने न केवल यूरेनियम संवर्धन की सीमा को बढ़ाया बल्कि सेंट्रीफ्यूज की संख्या में भी भारी इजाफा किया. इजरायल का मानना है कि परमाणु संपन्न ईरान उसके अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा है, इसलिए वह किसी भी कीमत पर ईरान को परमाणु बम बनाने से रोकना चाहता है.
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ओमान वार्ता और 2026 का अल्टीमेटम
साल 2026 की शुरुआत में यह विवाद अपने चरम पर पहुंच गया. फरवरी 2026 में ट्रंप प्रशासन ने ओमान में एक नई वार्ता की पुष्टि की, जिसका मकसद ईरान को एक नए और ज्यादा सख्त 'सार्थक समझौते' के लिए मजबूर करना था. अमेरिका ने साफ चेतावनी दी थी कि अगर ईरान उनकी नई शर्तों को नहीं मानता है, तो उसे गंभीर सैन्य परिणाम भुगतने होंगे. दूसरी ओर फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन (E3) भी ईरान के रुख से नाराज थे. इन देशों ने साफ कर दिया था कि अगर ईरान पीछे नहीं हटा, तो वे 2025 तक संयुक्त राष्ट्र के पुराने प्रतिबंधों को 'स्नैपबैक' प्रक्रिया के तहत दोबारा लागू कर देंगे.
जंग की जमीन और परमाणु ठिकानों पर हमला
बातचीत के रास्ते बंद होने और धमकियों के दौर ने आखिरकार युद्ध की शक्ल ले ली. अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान के परमाणु केंद्रों और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाना शुरू कर दिया ताकि उसकी परमाणु क्षमता को पूरी तरह खत्म किया जा सके. ईरान ने भी अपनी संप्रभुता का हवाला देते हुए पलटवार किया और पूरे मिडिल ईस्ट में अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइलें दाग दीं. 11 साल पहले जो विवाद मेज पर सुलझाने की कोशिश की गई थी, वह अब बारूद और धमाकों के बीच एक खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है. अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर है कि क्या यह परमाणु विवाद किसी बड़े परमाणु युद्ध की शुरुआत तो नहीं है.