दुनिया भर में छिड़ी जंग की आग ने अब सुपरपावर अमेरिका के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं. ईरान, यूक्रेन और गाजा में चल रहे भीषण संघर्षों की वजह से अमेरिकी सेना के हथियारों का भंडार तेजी से खाली हो रहा है. लगातार मिसाइलों, ड्रोनों और गोला-बारूद की सप्लाई ने पेंटागन के जखीरे को उस स्तर पर ला दिया है जहां अब देश की सुरक्षा को लेकर सवाल उठने लगे हैं. अमेरिका ने अपने सहयोगियों की मदद के लिए जिस रफ़्तार से हथियारों के बक्से खोले, उस रफ़्तार से कारखानों में उत्पादन नहीं हो पाया. यही कारण है कि अब ट्रंप प्रशासन को अपनी सैन्य रणनीति में बड़ा बदलाव करने के लिए मजबूर होना पड़ा है.

व्हाइट हाउस में डिफेंस दिग्गजों की इमरजेंसी मीटिंग

हालात की गंभीरता को देखते हुए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बड़ा कदम उठाया है. ट्रंप प्रशासन जल्द ही व्हाइट हाउस में अमेरिका के सबसे बड़े रक्षा ठेकेदारों के साथ एक हाई-प्रोफाइल मीटिंग करने जा रहा है. इस बैठक में लॉकहीड मार्टिन, आरटीएक्स/रेथियॉन और बोइंग जैसे दिग्गज कंपनियों के टॉप अधिकारी शामिल होंगे. ट्रंप का सीधा मकसद इन कंपनियों को सरकारी मदद देकर हथियार उत्पादन की रफ़्तार को कई गुना बढ़ाना है. राष्ट्रपति चाहते हैं कि नौकरशाही की अड़चनों को खत्म कर युद्धस्तर पर फैक्ट्रियों में काम शुरू हो ताकि अमेरिका किसी भी बड़े वैश्विक खतरे से निपटने के लिए हमेशा तैयार रहे.

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50 अरब डॉलर के 'हथियार मिशन' का आगााज

पेंटागन ने खाली पड़े गोदामों को फिर से भरने के लिए लगभग 50 अरब डॉलर का एक अतिरिक्त बजट तैयार किया है. इस मोटी रकम का बड़ा हिस्सा टोमहॉक क्रूज मिसाइल जैसे सबसे घातक और भरोसेमंद हथियारों के उत्पादन को बढ़ाने में खर्च किया जाएगा. इसके अलावा एयर डिफेंस सिस्टम और लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलों के निर्माण पर भी जोर दिया जा रहा है. रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अभी उत्पादन नहीं बढ़ाया गया, तो भविष्य में अमेरिका को अपनी खुद की सुरक्षा के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ सकता है. यह बजट केवल हथियारों की खरीद के लिए नहीं बल्कि नई तकनीक के विकास के लिए भी इस्तेमाल होगा.

रक्षा क्षेत्र में रोजगार के अवसर

अमेरिका का यह कदम न केवल उसकी सैन्य ताकत को बढ़ाएगा बल्कि वहां के रक्षा उद्योग में जान फूंक देगा. उत्पादन बढ़ाने के इस फैसले से हजारों नए रोजगार पैदा होने की उम्मीद है. ट्रंप प्रशासन का मानना है कि 'पीस थ्रू स्ट्रेंथ' यानी ताकत के जरिए शांति तभी संभव है जब अमेरिका का शस्त्रागार दुनिया में सबसे आधुनिक और विशाल हो. यह संदेश ईरान और उसके समर्थकों के लिए भी है कि अमेरिका लंबी जंग लड़ने की पूरी क्षमता रखता है. अब देखना यह होगा कि अरबों डॉलर के इस निवेश के बाद अमेरिकी कंपनियां कितनी जल्दी अपनी सेना को फिर से शक्तिशाली बना पाती हैं.