अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव अब एक खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है जहाँ आसमान से बारूद बरसाने के बाद अब जमीन पर आमने-सामने की जंग की तैयारी है. पेंटागन की इमरजेंसी मीटिंग में ईरान के खिलाफ ग्राउंड ऑपरेशन शुरू करने के संकेत मिले हैं और यूएसएस त्रिपोली भी मध्य-पूर्व पहुंच चुका है. ट्रंप के इस खास ‘ऑपरेशन 5G’ के तहत करीब 10 हजार सैनिकों को होर्मुज में तैनात किया जा सकता है जिनका पहला निशाना सामरिक रूप से महत्वपूर्ण खार्ग आइलैंड होगा. हालांकि जानकारों का मानना है कि यह जंग इतनी आसान नहीं होगी क्योंकि ईरान के पास अभी भी 70 फीसदी मिसाइल स्टॉक बचा है और वह पिछले दो साल से इस युद्ध की तैयारी कर रहा था.
पांच चरणों में होगा हमला और द्वीपों पर कब्जे की रणनीति
अमेरिका ने इस जमीनी जंग को पांच बड़े चरणों में बांटने की योजना बनाई है ताकि कम से कम नुकसान में बड़ी जीत हासिल की जा सके. पहले चरण में ईरान की कोस्टल लाइन पर मौजूद सैन्य ठिकानों को एंटी शिप मिसाइलों और सी ड्रोन से तबाह किया जाएगा जिसके बाद फारस के द्वीपों का संपर्क मुख्य जमीन से काट दिया जाएगा. तीसरे और चौथे चरण में होर्मुज से समुद्री बारूद यानी माइन्स को हटाकर खार्ग जैसे द्वीपों पर मरीन कमांडो उतारे जाएंगे. पांचवें चरण में इन्हीं द्वीपों को बेस बनाकर अमेरिकी कमांडो हेलिकॉप्टर और पैराशूट के जरिए ईरान के भीतर घुसेंगे और वहां की टॉप लीडरशिप और मिसाइल स्टोरेज को पूरी तरह खत्म करने की कोशिश करेंगे.
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ईरान का ‘जहन्नुम’ वाला चैलेंज और गुरिल्ला युद्ध की तैयारी
अमेरिका की इन तैयारियों के बीच ईरान ने भी पीछे हटने के संकेत नहीं दिए हैं और अपनी मीडिया के जरिए साफ कहा है कि अमेरिकी सैनिकों का जहन्नुम में स्वागत है. ईरान ने अपनी 1500 किलोमीटर लंबी कोस्टल लाइन पर सुरंगों का जाल बिछा रखा है और वह अमेरिकी सेना को टनल ट्रैप में फंसाने की योजना बना रहा है. ईरान के पास बैलिस्टिक मिसाइलों की कोई कमी नहीं है और उसने अपने सभी बंदरगाहों पर मिसाइल लॉन्चर तैनात कर दिए हैं. वियतनाम और अफगानिस्तान के कड़वे अनुभवों को देखते हुए अमेरिका के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि कहीं वह ईरान के इस सुरंग नेटवर्क और गुरिल्ला युद्ध के चक्रव्यूह में बुरी तरह न फंस जाए.
अरब देशों पर मंडराता खतरा और फेल होने का डर
अगर अमेरिका का यह ग्राउंड ऑपरेशन किसी वजह से फेल होता है या इसमें देरी होती है तो इसका खामियाजा पूरे अरब क्षेत्र को भुगतना पड़ सकता है. ईरान पहले ही इजराइल पर बड़े हमले करके अपनी ताकत का ट्रेलर दिखा चुका है और अब वह अपनी हार टालने के लिए अरब देशों के तेल ठिकानों को निशाना बना सकता है. अमेरिका को दो मोर्चों पर लड़ना होगा जहाँ एक तरफ उसे जमीनी जंग जीतनी है तो दूसरी तरफ आसमान से हो रहे मिसाइल हमलों को भी रोकना होगा. ईरान को कमजोर समझने की भूल अमेरिका पर भारी पड़ सकती है क्योंकि एक बार सीधी जंग शुरू होने के बाद इसे रोकना किसी के बस में नहीं होगा और यह पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था को तबाह कर सकता है.
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