मिडिल ईस्ट में जारी भीषण युद्ध अब केवल सरहदों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़नी शुरू कर दी है. अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के तीन हफ्ते बाद जो आर्थिक आंकड़े सामने आ रहे हैं, वे डराने वाले हैं. ब्लूमबर्ग और अन्य वैश्विक सर्वे के मुताबिक, सर्विस और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर (PMI) में भारी गिरावट की आशंका जताई गई है. ऊर्जा की कीमतों में अचानक आए उछाल ने दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों की नींद उड़ा दी है. आलम यह है कि जहां ब्रिटेन ने ब्याज दरों में कटौती की योजना टाल दी है, वहीं ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों को महंगाई काबू करने के लिए दरें बढ़ाने पर मजबूर होना पड़ा है.

ट्रंप के सामने कठिन विकल्प

अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए आने वाला समय अग्निपरीक्षा जैसा है. फेडरल रिजर्व के अधिकारियों ने संकेत दिए हैं कि फिलहाल ब्याज दरों में किसी कटौती की उम्मीद नहीं है. क्योंकि गैस स्टेशनों पर बढ़ती कीमतें अमेरिकी नागरिकों की चिंता बढ़ा रही हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रपति ट्रंप के सामने अब दो ही रास्ते बचे हैं. या तो वे सैन्य अभियान खत्म कर ईरान को होर्मुज की खाड़ी खोलने का मौका दें. या फिर संघर्ष को इतना बढ़ा दें कि तेहरान घुटने टेकने पर मजबूर हो जाए. हालांकि, अब तक की भारी बमबारी के बावजूद ईरान का रुख नरम नहीं पड़ा है. जिससे वैश्विक निवेशकों के बीच अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है.

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जर्मनी से लेकर जापान तक छाई मायूसी

यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था जर्मनी में व्यावसायिक विश्वास 13 महीने के निचले स्तर पर पहुंच गया है. वहीं फ्रांस और इटली के हालात भी कुछ अलग नहीं हैं. एशिया की बात करें तो जापान में महंगाई दर भले ही कुछ समय के लिए 2% के लक्ष्य से नीचे आई हो. लेकिन युद्ध के कारण तेल की कीमतों में आई तेजी इस राहत को जल्द ही खत्म कर देगी. भारत, ऑस्ट्रेलिया और जापान जैसे देशों के मैन्युफैक्चरिंग आंकड़े अभी भी संघर्ष कर रहे हैं. चीन के औद्योगिक मुनाफे में भी सुस्ती देखी जा रही है. जिसका असर पूरी सप्लाई चेन पर पड़ रहा है. कुल मिलाकर, युद्ध की आग ने वैश्विक व्यापार के पहियों को जाम करना शुरू कर दिया है.

क्या 2026 में देखने को मिलेगी महामंदी?

आर्थिक विश्लेषक अब 2025 और 2026 के विकास अनुमानों में कटौती कर रहे हैं. अर्जेंटीना जैसे लैटिन अमेरिकी देशों में जीडीपी गिरने की आशंका है, तो चिली जैसे देशों में ईंधन आयात महंगा होने से संकट गहरा गया है. दक्षिण अफ्रीका से लेकर नॉर्वे तक के केंद्रीय बैंक अपनी मुद्राओं को गिरते हुए देख रहे हैं. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और ओईसीडी (OECD) के आगामी पूर्वानुमान इस बदलते इकोनॉमिक आउटलुक की और भी भयावह झलक पेश कर सकते हैं. अगर जल्द ही कूटनीतिक स्तर पर युद्ध विराम नहीं हुआ, तो दुनिया को ऐसी आर्थिक मंदी का सामना करना पड़ सकता है. जिससे उबरने में दशकों का समय लग जाएगा.