‘मक्का संयुक्त रक्षा समझौते’ यानी ‘इस्लामिक NATO’ को लेकर एक नई जानकारी सामने आई है. यह समझौता सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किए के बीच हुआ है, लेकिन तुर्किए के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने सऊदी अरब को दोटूक शब्दों में स्पष्ट कर दिया है कि यह समझौता ईरान या किसी अन्य देश के खिलाफ नहीं किया गया है. बल्कि समझौते में शामिल किसी सदस्य देश पर हमला हुआ तो ‘इस्लामिक NATO’ उसकी मदद तभी करेगा, जब वह औपचारिक रूप से मदद मांगेगा. अगर उसे मदद नहीं चाहिए तो हमला सिर्फ उसी देश पर हुआ माना जाएगा, न कि वह हमला पूरे ‘इस्लामिक NATO’ पर होगा.
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क्षेत्रीय स्थिरता के लिए एक महत्वपूर्ण कदम समझौता
बता दें कि ईरान को लेकर तुर्किए के स्पष्टीकारण से सऊदी अरब-पाकिस्तान के साथ हुई नई डिफेंस डील पर सवाल उठे. तुर्किए के विदेश मंत्री ने सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच हुए रक्षा समझौता ईरान को क्षेत्रीय स्थिरता के लिए एक महत्वपूर्ण कदम बताया है. लेकिन उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि तीनों देशों में किसी एक पर हमला तीनों पर हमला तब तक नहीं माना जाएगा, जब तक हमले का शिकार देश औपचारिक रूप से मदद नहीं मनेगा. तुर्किए के विदेश मंत्री का बयान सऊदी अरब के लिए बड़ा झटका है, क्योंकि अमेरिका के साथ जंग में ईरान ने सऊदी अरब पर खूब मिसाइल बरसाईं हैं.
सऊदी अरब ने ईरान के हमले से हुए नुकसान गिनाए
ईरान ने हमले करने के पीछे तर्क दिया था कि वह यह हमले खाड़ी देश पर नहीं, बल्कि खाड़ी देशों में बने अमेरिका के सैन्य ठिकानों पर कर रहा है. जबकि उस हमले में नुकसान तो सऊदी अरब के बनुियादी ढांचे, टूरिज्म और व्यापार का हुआ. देश को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा. बता दें कि सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्किए के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के बीच एक समझौता हुआ है, जिस पर सऊदी अरब के पवित्र शहर मक्का में हस्ताक्षर किए. इसमें प्रावधान है कि तीनों में से किसी एक पर हमला तीनों पर हमला नहीं माना जाएगा.
सदस्य बनने के इच्छुक देशों का तुर्किए ने स्वागत किया
‘मक्का संयुक्त रक्षा समझौता’ कच्चे तेल के भंडार सऊदी अरब, परमाणु शक्ति संपन्न पाकिस्तान और तुर्किए को दोस्त बनाता है, जिनके पास NATO की दूसरी सबसे बड़ी सेना है. तीनों के ड्रोन पूरी दुनिया में मशहूर हैं और तीनों देशों का डेफेंस सेक्टर तेजी से ग्रोथ कर रहा है. इस समझौते को ‘इस्लामिक NATO’ कहा जा रहा, क्योंकि समझौते में शामिल तीनों देश सुन्नी मुस्लिम देश हैं. अगर कोई देश इसका सदस्य बनना चाहता है तो उसका स्वागत भी इन तीनों देशों ने किया है. समझौता कोई लिखित दस्तावेज नहीं है, जिस पर हमने हस्ताक्षर किए हैं. इसके प्रावधान भी NATO के प्रावधानों की तरह नहीं हैं और न कभी होंगे.
औपचारिक मदद मांगने पर सहयोग को हाथ बढ़ाएंगे
तुर्किए के विदेश मंत्री फिदान ने बताया कि NATO के अनुच्छेद-5 में एक प्रावधान है कि अगर किसी एक देश पर हमला होता है तो उसे सभी 32 सदस्य देशों पर हमला माना जाएगा, लेकिन इस्लामिक NATO ऐसा नहीं है. अगर किसी एक देश पर हमला हुआ और वह औपचारिक मदद मांगता है तो तब दूसरे देश उस देश के साथ सीक्रेट इन्फॉर्मेशन शेयर करेंगे, लॉजिस्टिक्स हेल्प करेंगे और सैन्य टुकड़ियां तैनात करेंगे. समझौते के अनुसार तीनों देशों के विदेश और रक्षा मंत्री अपने सैन्य प्रमुखों के साथ एक रेगुलर मीटिंग करेंगे. तीनों देश का एक सचिवालय भी होगा, जिसे सऊदी अरब में खोला जाएगा.
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