मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच सऊदी अरब अब अमेरिका पर दबाव बना रहा है कि ईरान के बंदरगाहों की नाकेबंदी का प्लान छोड़ दें. वॉल स्ट्रीट जर्नल (WSJ) की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी अरब अब पर्दे के पीछे से ट्रंप प्रशासन पर यह दबाव बना रहा है. सऊदी अरब को डर है कि ट्रंप का यह आक्रामक कदम पूरे क्षेत्र को ऐसी आग में झोंक सकता है, जिससे निकलना नामुमकिन होगा.

क्यों डरा हुआ है सऊदी अरब?

दरअसल, ट्रंप प्रशासन ने ईरान की पस्त हो चुकी अर्थव्यवस्था को पूरी तरह घुटनों पर लाने के लिए होर्मुज स्ट्रेट से होने वाले हर तरह के ईरानी शिपमेंट को रोकने का फैसला किया है. लेकिन सऊदी अरब ने अमेरिका को चेतावनी दी है कि यदि ईरान को चारों तरफ से घेरा गया, तो वह चुप नहीं बैठेगा.

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सऊदी को डर है कि ईरान जवाबी कार्रवाई के तौर पर 'बाब अल-मंदेब' को बंद कर सकता है. यह लाल सागर का वह अहम रास्ता है, जहां से सऊदी अरब का बचा-कुचा तेल निर्यात होता है.

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हूती विद्रोही बन सकते हैं ईरान का हथियार

सऊदी अरब की चिंता का सबसे बड़ा कारण यमन के हूती विद्रोही हैं. बाब अल-मंदेब के पास के तटीय इलाकों पर हूतियों का नियंत्रण है, जो ईरान के 'एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस' का हिस्सा हैं. एक्सपर्ट्स का मानना है कि यदि ईरान इस रास्ते को बंद करना चाहता है, तो हूती उसके सबसे आसान और सक्षम पार्टनर साबित होंगे. गाजा संघर्ष के दौरान हूतियों ने पहले ही दिखा दिया है कि वे अंतरराष्ट्रीय जहाजों की आवाजाही को रोकने की पूरी ताकत रखते हैं.

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तेल की 'लाइफलाइन' पर खतरा

पिछले छह हफ्तों के युद्ध के दौरान, होर्मुज की नाकाबंदी के बावजूद सऊदी अपना तेल पाइपलाइनों के जरिए रेगिस्तान पार कराकर लाल सागर के रास्ते दुनिया को भेज रहा है. लेकिन अगर बाब अल-मंदेब भी बंद हो गया, तो सऊदी का तेल निर्यात पूरी तरह ठप हो जाएगा.

यही वजह है कि सऊदी अरब अब चाहता है कि अमेरिका 'आक्रामक नाकाबंदी' के बजाय कूटनीति का रास्ता अपनाए और ईरान के साथ बातचीत की मेज पर लौटे.