मध्य पूर्व में जारी भीषण युद्ध का सबसे बुरा असर अब पाकिस्तान पर पड़ने लगा है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने की आहट से कच्चे तेल और गैस के दाम आसमान छू रहे हैं जिसने पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है. वित्त मंत्री मोहम्मद औरंगजेब ने रविवार को एक बैठक में बेहद चिंताजनक आंकड़े पेश किए हैं. उन्होंने बताया कि मौजूदा हालात की वजह से पाकिस्तान का मासिक तेल इंपोर्ट बिल 600 मिलियन डॉलर तक बढ़ सकता है. पाकिस्तान पहले से ही कर्ज के बोझ तले दबा है और अब तेल की कीमतों ने सरकार की रातों की नींद हराम कर दी है. जनता पहले से ही महंगाई से त्रस्त है और अब तेल का यह बोझ उठाना उसके लिए नामुमकिन सा लग रहा है.
पेट्रोल-डीजल के दाम में लगी आग
पाकिस्तान सरकार ने ईंधन की कीमतों में भारी बढ़ोतरी का ऐलान कर दिया है जिससे आम आदमी की जेब पर बड़ा प्रहार हुआ है. पेट्रोल और हाई-स्पीड डीजल के रेट में सीधे 55 रुपये प्रति लीटर की वृद्धि की गई है जो लगभग 20 फीसद की बढ़त है. पेट्रोलियम मंत्री अली परवेज मलिक ने जनता से फ्यूल बचाने की अपील की है ताकि देश का मौजूदा रिजर्व कुछ और समय तक चल सके. हालात इतने खराब हैं कि पाकिस्तान एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के सामने झोली फैलाने की तैयारी कर रहा है. सरकार पेट्रोलियम लेवी में राहत के लिए गुहार लगाने वाली है ताकि बढ़ती कीमतों के फाइनेंशियल असर को कुछ कम किया जा सके.
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सप्लाई रूट का बढ़ता संकट
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव को देखते हुए पाकिस्तान को डर है कि उसकी एलएनजी (LNG) सप्लाई में भी बड़ी रुकावट आ सकती है. डॉन अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक अगर यह लड़ाई और ज्यादा बढ़ती है तो कच्चे तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं. ऐसी स्थिति से निपटने के लिए पाकिस्तान अब ओमान, सऊदी अरब और यूएई जैसे देशों के साथ कूटनीतिक बातचीत कर रहा है. होर्मुज स्ट्रेट के अलावा दूसरे सप्लाई रूट तलाशने की कोशिशें भी तेज कर दी गई हैं ताकि देश में ईंधन की कमी न हो. सोमवार को तीन पेट्रोलियम शिपमेंट पहुंचने की उम्मीद है लेकिन अनिश्चितता का माहौल अभी भी बना हुआ है.
अमरीका की जी हुजूरी पड़ी भारी
पाकिस्तान की जनता और जानकारों का मानना है कि प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और आर्मी चीफ आसिम मुनीर की अमरीका के प्रति 'जी हुजूरी' वाली नीति देश को भारी पड़ रही है. अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रभाव में आकर पाकिस्तान जिस तरह की विदेश नीति अपना रहा है उसने उसे बिना लड़े ही इस जंग के बीच फंसा दिया है. पाकिस्तान न तो इस युद्ध का हिस्सा है और न ही उसका इसमें कोई सीधा फायदा है लेकिन आर्थिक रूप से वह सबसे ज्यादा चोट खा रहा है. अब हालात ऐसे हैं कि सरकार के पास न तो पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार है और न ही बढ़ती कीमतों को रोकने का कोई ठोस प्लान. आने वाले दिन पाकिस्तान के लिए और भी चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं.