ईरान और अमेरिका में 40 दिनों बाद आखिरकार सीज हो ही गया। राष्ट्रपति ट्रंप और ईरान ने सीजफायर के लिए पाकिस्तान के पीएम शहबाज शरीफ और आर्मी चीफ मुनीर को क्रेडिट दिया। लेकिन ये बात किसी को हजम नहीं हुई। हर जगह ये चर्चा है कि इस युद्ध की मध्यस्ता पाकिस्तान कैसे करा सकता है। लोगों का शक जायज है। कई मीडिया रिपोर्ट में सामने आया है कि सीजफायर का असली सूत्रधार चीन है। आखिर चीन ने मिडिल ईस्ट में शांति की पहल क्यों की। विस्तार से जानते हैं।
गत 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने संयुक्त रूप से ईरान पर हमला कर दिया था। दोनों का आरोप था कि ईरान परमाणु हथियार बना रहा है। इससे युद्ध की शुरुआत हो गई। शुरुआत में ही ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई की मौत गई। धीरे-धीरे कई बड़े ईरानी नेता और सैन्य अधिकारियों की मौत हो गई। ईरान ने दुनिया के बड़े जलमार्गों में से एक हॉर्मुज स्ट्रेट को बंद कर दिया। इससे युद्ध मिडिल ईस्ट से निकल दुनिया का विषय बन गया। दुनिया में कच्चे तेल और एलपीजी गैस की किल्लत शुरू हो गई।
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कई प्रयासों के बाद आखिरकार 8 अप्रैल को ईरान और अमेरिका में सीजफायर में गया। 10 शर्तों के साथ दोनों युद्ध रोकने पर सहमत हो गए। ट्रंप और ईरान ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और आर्मी चीफ मुनीर को सीजफायर का क्रेडिट दिया। इससे पाक की चर्चा होने लगी। लेकिन इसके पीछे खेल कुछ और ही है। सीजफायर कराने के लिए चीन का नाम सामने आया है।
बता दें कि इसकी बड़ी वजह चीन की इकोनॉमी है। चीन और अमेरिका के बीच पहले ही ट्रेड डील को लेकर संबंध खराब हो गए थे। इसके विकल्प के रूप में चीन ने मिडिल ईस्ट में अपना कारोबार शिफ्ट किया था। बीजिंग के लिए इकोनॉमी सबसे पहले आती है।
मिडिल ईस्ट में जंग के बीच पाकिस्तान के विदेश मंत्री चीन गए थे। दोनों देशों ने सीजफायर के लिए ड्राफ्ट तैयार किया था। दोनों देशों ने ज्वाइंट बयान दिया था। चीन और पाक ने हॉर्मुज स्ट्रेट को खोलने और उसकी सुरक्षा की बात कही गई थी।
चीन को दुनिया की फैक्ट्री कहा जाता है। चीन कच्चे तेल का बड़ा आयातक है। चीन में इकोनॉमी के हालात बेहतर नहीं है। युद्ध के माहौल में कच्चे तेल के आयात पर फर्क पड़ेगा। इससे चीन की बाकी इंडस्ट्री पर काफी फर्क पड़ेगा। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग को अपनी स्थिर ग्लोबल इकोनॉमी की चिंता है।
मिडिल ईस्ट ही क्यों?
चीन और अमेरिका के बीच ट्रेड डील जनवरी 2018 में खराब होनी शुरू हुई जब ट्रंप प्रशासन ने चीनी उत्पादों पर टैरिफ लगाना शुरू किया। यह विवाद मुख्य रूप से अनपेक्षित व्यापार घाटे, बौद्धिक संपदा चोरी के आरोपों, और जनवरी 2020 में हस्ताक्षरित 'फेज वन' समझौते के तहत चीन द्वारा वादे के अनुसार अमेरिकी सामान न खरीदने के कारण गहराया। इस हालात में चीन ने अन्य देशों में अपना बाजार खोजना शुरू कर दिया था। इस दौरान मिडिल ईस्ट में चीन को अच्छा बाजार मिला।
मिडिल ईस्ट से चीन का ट्रेड संबंध
चीन ईरान का सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर है। यही नहीं ईरान के तेल का 80 फीसदी चीन खरीदता है। मिडिल ईस्ट में चीन को बड़ा एक्सपोर्ट बाजार मिला। इलेक्ट्रिक कारों के लिए ईरान बड़ा बाजार साबित हुआ। इसके अलावा मिडिल ईस्ट में चलने वाले डिसैलिनेशन प्लांट्स (पीने की पानी) में सबसे बड़ा इंवेस्टर बन गया। यूएई, ओमान, इराक में पॉवर कंस्ट्रेक्शन ऑफ चाइना के प्रोजेक्ट हैं। इकोनॉमी रिश्तों के चलते चीन ने अमेरिका के सहयोगी जैसे सऊदी अरब और उसके विरोधियों जैसे ईरान दोनों के साथ रिश्ते बनाए हुए हैं।
चीन पहले भी करा चुका है समझौता
साल 2023 और सऊदी और ईरान के बीच समझौता कराया था। साल 2016 के रिश्ते तब टूटे थे जब सऊदी ने इस बड़े शिया मु्स्लिम स्कॉलर को फांसी दे दी थी। तब चीन ने मध्यस्ता की भूमिका संभाली और दोनों पक्षों में राजनयिक संबंध सुधारने पर सहमत हो गए थे। ये चीन के हित में था। 1 साल बाद चीन ने 14 फिलिस्तीनों गुटों के नेताओं की मेजबानी की थी। इस बातचीत में कब्जा वाले वेस्ट बैंक और गाजा के लिए राष्ट्रीय एकता वाली सरकार बनी थी।
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