Iran Israel War Update: क्या मिडिल ईस्ट की जंग दुनिया में विश्व युद्ध को दस्तक दे चुकी है? अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान पर हमला किया है। ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए 7 खाड़ी देशों में अमेरिका के सैन्य ठिकानों पर हमला कर दिया है। ईरान की इस कार्रवाई के विरोध में यूरोपीय संघ और NATO देश आ गए हैं। उधर हिजबुल्लाह, हूती और अन्य आतंकी संगठन ईरान के समर्थन में इजरायल पर हमला कर रहे हैं। लाल सागर और होर्मुज खाड़ी ब्लॉक हो सकती है।
युद्धक्षेत्र में उतर सकती है NATO देशों की सेना
बेशक रूस-चीन और पाकिस्तान ने ईरान का समर्थन किया है, लेकिन 7 खाड़ी देशों समेत यूरोपीय संघ, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी ईरान के विरोधी हो गए हैं। NATO देशों की सेना खाड़ी देशों का बचाव करने को रणक्षेत्र में उतर सकती है। इन सभी देशों ने अमेरिका के साथ मिलकर ईरान के हमलों को रोकने की तैयारी कर ली है। एक जॉइंट स्टेटमेंट जारी करके ये देश कह चुके हैं कि नागरिकों और संप्रभुता की रक्षा में एकजुट खड़े हैं। ईरान के हमलों के खिलाफ आत्मरक्षा के अधिकार को दोहराते हैं।
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चीन और रूस ने हमले को अमानवीय बताया
रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन को शोक संदेश भेजा है, जिसमें अमेरिका और इजरायल के हमले की तीखी निंदा की गई है। पुतिन ने खामेनेई और उनके परिवार की 'हत्या' को अमानवीय करार दिया है। ईरान पर हमले को पुतिन ने अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करार दिया है। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने भी कहा कि ईरान के सर्वोच्च नेता खामेनेई की हत्या ईरान की संप्रभुता और सुरक्षा का गंभीर उल्लंघन है। चीन ने इसे संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों का अपमान बताया।
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ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी ने साफ कहा है कि वे अमेरिका के साथ मिलकर ईरान के हमलों को रोकेंगे। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज का कहना है कि ईरान के हमले से मध्य पूर्व में तैनात उनके सैनिकों और नागरिकों की जान खतरे में पड़ रही है। अपने हितों और सहयोगी देशों के नागरिकों की सुरक्षा के लिए जरूरी और संतुलित कदम उठाने होंगे। इसके लिए अमेरिका तीनों देशों के सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल कर सकता है।
ईरान और इजरायल-अमेरिका युद्ध में बढ़ते तनाव के बीच फ्रांस ने अपने विमानवाहक पोत चार्ल्स डी गॉल को पूर्वी भूमध्य सागर में तैनात कर दिया है। यह तैनाती अबू धाबी में फ्रांस के एयरपोर्ट पर ईरानी मिसाइलों के हमले के बाद हुई है। ब्रिटेन ने अमेरिका को ईरान के खिलाफ हमलों के लिए मिलिट्री बेस के इस्तेमाल की इजाजत दी तो ईरान ने ड्रोन से साइप्रस में एयर बेस पर हमला किया। इसके बाद ब्रिटेन ने अमेरिका को डिएगो ग्रेसिया मिलिट्री बेस इस्तेमाल करने को अमेरिका को का दिया।
ब्रिटेन के फाइटर जेट अमेरिकी एयरफोर्स के साथ आसमान में मंडरा रहे हैं, लेकिन ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर का यह भी कहना है कि इसका मतलब यह नहीं कि हम युद्ध में शामिल हो रहे हैं। सिर्फ बचाव करने के लिए मिलिट्री बेस इस्तेमाल करने की इजाजत दी गई है। ईरानी मिसाइलों को आसमान में ही नष्ट करना, उनके स्टॉक और मिसाइल लॉन्चर को तबाह करना मकसद है। अमेरिका ने ब्रिटिश ठिकानों का उपयोग करने की अनुमति मांगी है और हमने अनुरोध स्वीकार किया।
यूरोपीय आयोग की उपाध्यक्ष काजा कल्लास ने ट्वीट किया कि मध्य पूर्व के कई देशों पर ईरान के हमले अक्षम्य हैं। ऐसा तनाव नहीं बढ़ना चाहिए, जो यूरोप के लिए भी खतरा पैदा कर सकता है। इसलिए मिडिल ईस्ट में यूरोपीय संघ के नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सभी आवश्यक कदम उठा रहे हैं। तनाव कम करने और ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने के लिए एक स्थायी समाधान निकालने के सभी राजनयिक प्रयासों में अपना योगदान जारी रखेंगे।
अगर ईरान किसी तरह अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमला करता है तो NATO देश इस जंग में जरूर खींचे चले आ सकते हैं। दरअसल, NATO देशों में से अगर किसी एक देश पर हमला होता है तो संगठन में शामिल सभी देशों को युद्ध में शामिल होना होता है। ऐसे में जंग अगर ज्यादा बढ़ती है तो अमेरिका अपने साथी यूरोपीय देशों पर इस युद्ध में शामिल होने का दबाव बना सकता है। वैसे इस परिस्थिति की नौबत आते नजर नहीं आ रही है।
ईरान के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत मोर्चा बन सकता है। इस बयान से यह साफ हो गया है कि पश्चिमी देशों का धैर्य अब जवाब दे रहा है और अगर ईरान ने हमले जारी रखे, तो उसे कड़ा जवाब मिल सकता है।