Cluster Bomb Explainer: मिडिल ईस्ट में तनाव गहरा गया है। इजरायल-अमेरिका और ईरान की जंग 28 फरवरी से जारी है, जिसमें 10 से ज्यादा अरब देश भी बमबारी, मिसाइल और ड्रोन अटैक झेल रहे हैं। क्योंकि इजरायल और अमेरिका ने ईरान पर हमला किया तो ईरान ने बदला लेते हुए इजरायल पर हमला किया, लेकिन इजरायल ने ईरान पर क्लस्टर बमों से हमला करने का आरोप लगाया है। इजरायल ने क्लस्टर बमों के इस्तेमाल को अंतर्राष्ट्रीय कानून के खिलाफ बताते हुए इसे मानवाधिकारों का उल्लंघन बताया है।

क्लस्टर बम क्या हैं और काम कैसे करते?

क्लस्टर बम को एरिया वेपन, बॉम्बलेट और सबम्युनिशन्स भी कहा जाता है। क्लस्टर बम वह हथियार है, जिसे मिसाइल में इंस्टॉल करके या बम के अंदर पैक करके लॉन्च किया जाता है। जब मिसाइल या बम को लॉन्च किया जाता है और उनका वारहेड यानी मेन कंटेनर आसमान में खुलता है तो छोटे-छोटे विस्फोटक आसमान में फैल जाते हैं, जो अलग-अलग जगहों पर गिरकर बुरी तरह फटते हैं। कुछ मामलों में क्लस्टर बम तुरंत नहीं फटते, बल्कि बारूदी सुरंग या लैंडमाइन की तरह फैल जाते हैं और पैर पड़ने पर फटते हैं।

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क्लस्टर बम कितने खतरनाक हो सकते?

क्लस्टर बम को मिसाइल या बम के जरिए लॉन्च करके एक साथ कई जगहों पर या कई शहरों में हमले किए जा सकते हैं। क्लस्टर बम का कैरियर जब हवा में फटता है तो क्लस्टर बम फुटबॉल मैदान जितने बड़े एरिया को कवर कर सकते हैं। एक क्लस्टर कंटेनर 9 से लेकर कई सौ सबम्युनिशन छोड़ सकता है। हर क्लस्टर बम का एक एक्सप्लोसिव चार्ज और फ्रैगमेंटेशन सिस्टम होता है। दिखने में छोटे लगने वाले क्लस्टर बम खतरनाक होते हैं। 50 से 100 मीटर के दायरे में भीषण तबाही मचा सकते हैं। कई लोगों के चोटिल या मौत होने का खतरा होता है।

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2 से 40 प्रतिशत क्लस्टर बम तुरंत नहीं फटते। बल्कि वे बारूदी सुरंग या लैंडमाइन की तरह बिछ जाते हैं और तब फटते हैं, जब इन पर पैर पड़ता है। कई साल तक यह जमीन पर बिखते रह सकते हैं। इसलिए जंग खत्म होने के बाद भी कई साल तक इनका खतरा बना रह सकता है। क्योंकि क्लस्टर बम सेना के जवानों, सैन्य ठिकानों और आम लोगों के बीच अंतर नहीं कर पाते, जिस वजह से क्लस्टर बम रिहायशी इलाकों में भारी तबाही मचा सकते है। लोगों की जान लेने वाले इन्ही क्लस्टर बमों का इस्तेमाल करने आरोप इजरायल ने ईरान पर लगा दिया है।

क्लस्टर बमों के लिए अंतर्राष्ट्रीय कानून?

बता दें कि क्लस्टर बमों के खतरे और नुकसान हो भांपते हुए साल 2008 में क्लस्टर म्यूनिशन कन्वेंशन हुआ था, जिसके तहत पेश किए प्रस्ताव पर 100 से ज्यादा देशों ने साइन किए थे। यह एक प्रकार का समझौता है, जिसके तहत क्लस्टर बमों के प्रोडक्शन, खरीद-बिक्री और इस्तेमाल पर रोक रहेगी। यानी समझौते पर साइन करने वाले देश इनका इस्तेमाल नहीं करेंगे। ईरान, इजरायल, रूस, यूक्रेन, अमेरिका, चीन और भारत समेत कई देश इस समझौते में शामिल नहीं हुए थे, लेकिन यह देश भी युद्ध के समय क्लस्टर बमों का इस्तेामाल करने से परहेज करते आए हैं।

अमेरिका बमों का इस्तेमाल नहीं करता

बता दें कि अमेरिका के पास 9 किलोग्राम (20 पाउंड) वजन वाले M-41 बम हैं, जो 6 या 25 के ग्रुप में तारों से जोड़कर बनाया जाता है। 1970 से 1990 के दशक तक इन बमों को हवाई हमलों के दौरान इस्तेमाल किया जाता था। दुनियाभर के करीब 34 देशों के पास क्लस्टर बम हैं और 23 देशों के द्वारा इनका इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन साल 2008 में अमेरिका ने क्लस्टर बमों के फटने की सिर्फ एक प्रतिशत संभावना होने के कारण इनका इस्तेमाल नहीं करने का वादा कन्वेंशन के सदस्यों से किया था, लेकिन अमेरिका ने इनके इस्तेमाल पर प्रतिबंध नहीं लगाया है।

क्लस्टर बम बनाने में कितना खर्च आता?

बता दें कि टाइप, डिलीवरी और टेक्नोलॉजी के अनुसार क्लस्टर बम को बनाने की लागत अलग-अलग होती है। आर्टिलरी शेल में इस्तेमाल होने वाले क्लस्टर बम सस्ते होते हैं। एडवांस्ड गाइडेड सिस्टम में इस्तेमाल होने वाले, टारगेटिंग टेक्नोलॉजी से लैस मॉडर्न स्मार्ट क्लस्टर बम महंगे होते हैं। अगर इन्हें बैलिस्टिक मिसाइलों में इस्तेमाल किया जाएगा तो यह और ज्यादा महंगे होंगें। एक स्टैंडर्ड 155 MM वाले आर्टिलरी शेल में इस्तेमाल होने वाले क्लस्टर बम का रेट 500 से 3000 के बीच हो सकता है। इंडियन करेंसी में यह रेट 42000 रुपये से लेकर ढाई लाख तक हो सकता है।