मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है और इसका सीधा असर अब एलपीजी गैस की सप्लाई पर दिखने लगा है. प्रभावित होने वाले देशों में भारत भी शामिल है जहां कई शहरों में एलपीजी सिलेंडर की किल्लत की खबरें आ रही हैं. इस संकट के बीच हर किसी के मन में यह सवाल है कि आखिर इस गैस का उत्पादन कैसे होता है और दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक कौन है. दरअसल मिडिल ईस्ट के देशों से होने वाली सप्लाई में रुकावट के कारण ग्लोबल मार्केट में अस्थिरता पैदा हो गई है जिससे आम आदमी की रसोई का बजट बिगड़ने का खतरा मंडरा रहा है.
अमेरिका है गैस उत्पादन का बेताज बादशाह
शायद बहुत कम लोग जानते होंगे कि अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा एलपीजी उत्पादक देश है. एलपीजी का उत्पादन मुख्य रूप से कच्चे तेल के शोधन यानी रिफाइनिंग और प्राकृतिक गैस के प्रसंस्करण के दौरान एक उप-उत्पाद के रूप में किया जाता है. जब रिफाइनरी में तेल को साफ किया जाता है तब कई गैसें निकलती हैं जिन्हें स्टोर कर लिया जाता है. अमेरिका के पास आधुनिक तकनीक और विशाल रिफाइनरी नेटवर्क है जिसके कारण वह दुनिया के बड़े हिस्से को गैस की सप्लाई करता है. वर्तमान युद्ध की स्थिति में अमेरिका जैसे उत्पादक देशों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है.
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कैसे बनती है रसोई गैस (LPG)?
एलपीजी गैस मुख्य रूप से दो प्रमुख गैसों से मिलकर बनती है जिनमें प्रोपेन और ब्यूटेन शामिल हैं. इन गैसों को कच्चे तेल की रिफाइनिंग और प्राकृतिक गैस के प्रोसेसिंग के दौरान अलग किया जाता है. जब क्रूड ऑयल को रिफाइनरी में ऊंचे तापमान पर गर्म किया जाता है तो अलग-अलग स्तरों पर कई तरह के ईंधन और गैसें प्राप्त होती हैं. इन्हीं गैसों में से प्रोपेन और ब्यूटेन को चुनकर उन्हें उच्च दबाव में तरल यानी लिक्विड रूप में बदल दिया जाता है. यही वजह है कि इसे ‘लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस’ यानी एलपीजी कहा जाता है जो हमारे घरों तक सिलेंडर में पहुंचती है.
उच्च दबाव और तरल रूप का विज्ञान
गैसों को तरल में बदलने की प्रक्रिया काफी जटिल और तकनीकी होती है ताकि इन्हें सुरक्षित तरीके से ट्रांसपोर्ट किया जा सके. जब इन गैसों पर बहुत ज्यादा दबाव डाला जाता है तो ये द्रव का रूप ले लेती हैं जिससे कम जगह में ज्यादा गैस स्टोर करना आसान हो जाता है. सिलेंडर के भीतर यह गैस लिक्विड फॉर्म में होती है लेकिन जैसे ही रेगुलेटर के जरिए बाहर निकलती है यह वापस गैस बन जाती है. मिडिल ईस्ट के मौजूदा हालात को देखते हुए भारत अब अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए नए विकल्पों और भंडारण क्षमताओं पर जोर दे रहा है ताकि घरेलू उपभोक्ताओं को किसी बड़ी परेशानी का सामना न करना पड़े.
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