अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव को खत्म करने के लिए पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में एक अहम शांति वार्ता शुरू होने जा रही है. इस बातचीत में अमेरिका की ओर से उपराष्ट्रपति जेडी वेंस नेतृत्व कर रहे हैं. ये बातचीत इसलिए भी खास मानी जा रही है क्योंकि 1979 के बाद ये दोनों देशों के बीच सबसे हाई लेवल की सीधी बातचीत है. दरअसल, पिछले कुछ हफ्तों में अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध जैसे हालात बन गए थे, जिससे पूरी दुनिया में चिंता बढ़ गई. इस बीच पाकिस्तान ने मध्यस्थ की भूमिका निभाते हुए दोनों देशों को बातचीत के लिए एक मंच पर लाने की कोशिश की.

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जेडी वेंस ही क्यों कर रहे हैं नेतृत्व?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस बातचीत का नेतृत्व जेडी वेंस को ही क्यों सौंपा गया. रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान वेंस को अमेरिका के अंदर एक 'एंटी-वॉर' यानी युद्ध का समर्थन ना करने वाले नेता के तौर पर देखता है. इसी वजह से ईरान को लगता है कि वेंस के साथ बातचीत सफल हो सकती है. इतना ही नहीं, वेंस पहले भी बैकचैनल बातचीत के जरिए सीजफायर कराने में अहम भूमिका निभा चुके हैं. इसलिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उन्हें इस मिशन की जिम्मेदारी दी है.

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क्या है इस बातचीत का मकसद?

इस्लामाबाद में हो रही इस बैठक का मकसद दोनों देशों के बीच चल रहे संघर्ष को खत्म करना और स्थायी शांति कायम करना है. साथ ही, खाड़ी क्षेत्र में स्थिरता लाना भी इस वार्ता का बड़ा लक्ष्य है. वेंस जल्द ही ईरान के संसद अध्यक्ष मोहम्मद बगेर गालिबफ और विदेश मंत्री सैयद अब्बास अरघची से मुलाकात करेंगे. उनके साथ विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर भी होंगे.दोनों देशों के बीच तनावपूर्ण इतिहास को देखते हुए ये कहना मुश्किल है कि वो हाथ मिलाएंगे या नहीं, लेकिन नेताओं से ये उम्मीद की जा रही है कि वो उस स्थिति को और ज्यादा बढ़ाने से बचेंगे जो पहले ही ग्लोबल इकोनॉमी के लिए महंगी साबित हो चुकी है.

विटकोफ-कुशनर को लेकर ईरान की राय

दरअसल, माना जाता है कि वेंस युद्ध की रणनीति बनाने में कम और उसे खत्म करने में ज्यादा रुचि रखते हैं, लेकिन विटकोफ और कुशनर के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि पिछली वार्ताओं के विफल होने से ईरान की नजर में उनके प्रति अविश्वास पैदा हो गया है. ईरानी अधिकारी पिछली वार्ताओं के असफल होने के लिए इन दोनों को जिम्मेदार मानते हैं, उनका मानना ​​है कि उन्होंने राजनयिक संबंधों के बजाय सैन्य संघर्ष को चुना. हालांकि ईरान-अमेरिका के बीच शांति वार्ता शुरू होने वाली है, लेकिन राह आसान नहीं है. ईरान ने कुछ शर्तें रखी हैं, जैसे आर्थिक प्रतिबंध हटाना और अपने फंड्स को जारी करना. वहीं अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर रोक लगाए. इसके अलावा, दोनों देशों के बीच भरोसे की कमी भी एक बड़ी चुनौती है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ये बातचीत सफल नहीं होती, तो क्षेत्र में तनाव और बढ़ सकता है.

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