India US rare earth deal: 0भारत और अमेरिका ने चीन को एक बड़ा रणनीतिक झटका देते हुए ‘रेयर अर्थ मिनरल्स’ (दुर्लभ खनिजों) की सप्लाई को सुरक्षित करने के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण समझौता किया है. इस महाडील के तहत भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया (क्वाड देशों) ने मिलकर इन बेहद जरूरी खनिजों के खनन, प्रोसेसिंग और रीसाइक्लिंग के क्षेत्र में 20 अरब डॉलर (करीब 1.6 लाख करोड़ रुपये) का भारी-भरकम निवेश जुटाने का लक्ष्य रखा है. इस कदम से भविष्य की तकनीकों और इलेक्ट्रॉनिक्स बाजार पर चीन का एकछत्र राज खत्म होने की उम्मीद है.
चीन के एकाधिकार पर लगेगी लगाम
मौजूदा समय में दुनिया के कुल रेयर अर्थ मिनरल्स को रिफाइन और प्रोसेस करने के करीब 80 फीसदी बाजार पर चीन का कब्जा है. इतना ही नहीं, वैश्विक निर्यात में भी चीन का नियंत्रण करीब 94 फीसदी है. चीन अक्सर अपनी कूटनीतिक और व्यापारिक बातें मनवाने के लिए दूसरे देशों को होने वाली इन खनिजों की सप्लाई रोकने की धमकी देता रहता है. क्वाड देशों की यह नई पार्टनरशिप ड्रैगन की इसी दादागीरी को खत्म करने के लिए की गई है. इस ऐतिहासिक डील पर हस्ताक्षर के दौरान विदेश मंत्री एस जयशंकर ने साफ किया कि इसका मुख्य उद्देश्य महत्वपूर्ण खनिजों की सप्लाई चेन में सहयोग को मजबूत करना है, ताकि संकट के समय किसी एक देश पर निर्भर न रहना पड़े.
क्या हैं ये मिनरल्स और क्यों हैं जरूरी?
क्रिटिकल मिनरल्स में मुख्य रूप से लिथियम, कोबाल्ट और रेयर अर्थ एलिमेंट्स शामिल होते हैं. आज के आधुनिक दौर में इलेक्ट्रिक कारों की बैटरियां, मोबाइल फोन, लैपटॉप, सेमीकंडक्टर चिप्स से लेकर सेना के बड़े मिसाइल और डिफेंस सिस्टम बनाने तक में इन्हीं खनिजों का इस्तेमाल होता है. अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी इस डील को लेकर कड़े तेवर दिखाए और कहा कि हम अपने उद्योगों की रीढ़ माने जाने वाले इन खनिजों को चीन के हाथों में नहीं छोड़ सकते.
भारत के प्रयास और आगे की बड़ी चुनौतियां
भारत इन महत्वपूर्ण खनिजों को हासिल करने के लिए लगातार वैश्विक स्तर पर कदम बढ़ा रहा है. भारत की सरकारी कंपनी ‘काबिल’ (KABIL) ने हाल ही में अर्जेंटीना में पांच लिथियम ब्लॉकों को विकसित करने के लिए एक बड़ा समझौता किया है, जो देश का पहला विदेशी लिथियम प्रोजेक्ट है. इसके अलावा जापान, ऑस्ट्रेलिया और म्यांमार के साथ भी सहयोग बढ़ाया जा रहा है.
हालांकि, भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती प्रोसेसिंग क्षमता की कमी है. भारत के पास लगभग 70 लाख टन रेयर अर्थ ऑक्साइड का भंडार मौजूद है, जो दुनिया में पांचवां सबसे बड़ा भंडार है. लेकिन देश की रिफाइनिंग क्षमता घरेलू मांग के 25 फीसदी से भी कम है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि नई खदानें खोलने के मुकाबले प्रोसेसिंग यूनिट्स और रिफाइनिंग क्षमता को विकसित करना ज्यादा चुनौतीपूर्ण है, जिसमें यह 20 अरब डॉलर का क्वाड फंड भारत के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है.
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