पश्चिम बंगाल की सत्ता हाथ में आते ही सीएम सुवेंदु अधिकारी ताबड़तोड़ फैसले ले रहे हैं. राज्य में नई सरकार बनने के बाद वरिष्ठ IAS अधिकारी मनोज कुमार अग्रवाल को पश्चिम बंगाल का नया मुख्य सचिव नियुक्त किया गया है. सरकार ने रिटायर्ड आईएएस अधिकारी सुब्रता गुप्ता को मुख्यमंत्री के सलाहकार के रूप में भी नियुक्त किया है. लेकिन इन नियुक्तियों के साथ ही सियासी विवाद भी शुरू हो गया है. तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने इस फैसले पर सवाल उठाते हुए इसे चुनाव प्रक्रिया से जोड़ दिया है. बीजेपी ने दोनों नियुक्तियों का बचाव करते हुए कहा है कि ये ‘योग्यता आधारित’ थीं और देश के कानूनों की गरिमा को बहाल करने के अपने वादे के मुताबिक थीं.
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कौन हैं मनोज अग्रवाल?
मनोज कुमार अग्रवाल 1990 बैच के IAS अधिकारी हैं और पश्चिम बंगाल कैडर से जुड़े रहे हैं. उन्होंने राज्य सरकार के कई अहम विभागों में काम किया है. प्रशासनिक सुधार, खाद्य विभाग, वन विभाग और फायर एंड इमरजेंसी सर्विसेज जैसे विभागों में उन्होंने जिम्मेदारी संभाली थी. हाल ही में हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के दौरान वो राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी (CEO) थे. चुनाव कराने, वोटर लिस्ट संशोधन और मतदान प्रक्रिया की निगरानी की जिम्मेदारी उनके पास थी. इसी वजह से उनका नाम चुनावी विवादों के केंद्र में भी रहा. दरअसल, चुनाव से पहले पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट की विशेष गहन समीक्षा यानी SIR प्रक्रिया को लेकर बड़ा विवाद हुआ था. आरोप लगे थे कि लाखों मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए. मनोज अग्रवाल ने उस समय कहा था कि हटाए गए नाम डुप्लीकेट, मृत, शिफ्ट हो चुके या गलत एंट्री वाले लोगों के थे. उन्होंने दावा किया था कि पूरी प्रक्रिया निष्पक्ष तरीके से की गई.
टीएमसी ने उठाए सवाल
TMC ने SIR प्रकिया पर सवाल उठाए थे. पार्टी का आरोप था कि चुनाव आयोग और कुछ अधिकारियों ने BJP के पक्ष में काम किया. चुनाव नतीजों में TMC की हार के बाद ये आरोप और तेज हो गए. अब मनोज अग्रवाल को मुख्य सचिव बनाए जाने पर TMC इसे इनाम बता रही है. राजनीतिक रूप से ये नियुक्ति इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि पश्चिम बंगाल में पहली बार BJP की सरकार बनी है और सुवेंदु अधिकारी मुख्यमंत्री बने हैं. नई सरकार प्रशासनिक ढांचे में तेजी से बदलाव कर रही है. रिपोर्ट्स के मुताबिक मनोज अग्रवाल जुलाई 2026 में रिटायर होने वाले हैं, इसलिए उनका कार्यकाल ज्यादा लंबा नहीं होगा. इसके बावजूद उनकी नियुक्ति ने बंगाल की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है.
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