15 साल पहले स्विट्जरलैंड से भारत आईं सैंड्रा लावी गोजकोविक ने कभी नहीं सोचा था कि पश्चिम बंगाल का एक दूरदराज गांव उनका पक्का ठिकाना बन जाएगा. सैंड्रा भारत केवल कुछ आर्थिक मदद देने के इरादे से आई थीं, लेकिन जमीनी हकीकत देखकर उन्होंने खुद बदलाव लाने का फैसला किया. उन्होंने पश्चिम बंगाल के सुंदरबन स्थित ‘सागर द्वीप’ को चुना, जहां नाव के जरिए ही पहुंचा जा सकता है और जहां कठिन रास्तों की वजह से कोई अन्य एनजीओ काम नहीं करना चाहता था. वह वहां काफी समय तक रुकीं, अभिभावकों ने उन्हें बताया कि उनके बच्चों के पास पढ़ाई के लिए कोई भरोसेमंद जगह नहीं है. लोगों की बातें सुनीं.
मलेरिया से जंग और गुप्त तरीके से स्कूल का निर्माण
शुरुआत में सैंड्रा गंभीर रूप से मलेरिया की शिकार हो गईं और उन्हें इलाज के लिए वापस जाना पड़ा. डॉक्टरों के मना करने के बावजूद ठीक होते ही वे तुरंत भारत लौट आईं. जब सैंड्रा ने स्कूल खोलने का मन बनाया तो स्विट्जरलैंड में उनके परिजनों और दोस्तों ने इसका कड़ा विरोध किया. इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और उद्घाटन के दिन तक स्कूल की योजना को पूरी तरह गुप्त रखा. दीवारों के रंग से लेकर बच्चों की यूनिफॉर्म तक, सब कुछ सैंड्रा ने खुद तैयार किया.
बड़ी चिंता बनी हुई थी, कहीं कक्षाएं खाली न रह जाएं.
हालांकि, इमारत तैयार हो जाने के बावजूद सैंड्रा के मन में एक बड़ी चिंता बनी हुई थी, कहीं कक्षाएं खाली न रह जाएं. गांव के कई माता-पिता अपने बच्चों को खेतों में काम पर लगाने के कारण स्कूल भेजने से कतरा रहे थे. इस मुश्किल घड़ी में स्थानीय शिक्षकों ने बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. शिक्षकों ने खुद घर-घर जाकर माता-पिता को धैर्यपूर्वक समझाया कि शिक्षा उनके बच्चों का जीवन कैसे बदल सकती है. धीरे-धीरे शिक्षकों की इस लगन ने गांव वालों का दिल जीत लिया. जो माता-पिता पहले कतरा रहे थे, वे जल्द ही अपने बच्चों का दाखिला कराने के लिए कतारों में खड़े होने लगे.
50% से 100% पहुंचा बोर्ड रिजल्ट
नतीजा यह हुआ कि जिस इलाके में बोर्ड परीक्षा का पास प्रतिशत कभी 50% था, वह अब बढ़कर 100% हो चुका है. सैंड्रा की यह पहल केवल स्कूल तक सीमित नहीं रही. उन्होंने बाल विवाह, घरेलू हिंसा और मानव तस्करी के खिलाफ जागरूकता अभियान भी शुरू किया. इसके तहत 112 युवा लीडर्स तैयार किए गए, जिन्होंने 30 गांवों के लगभग 20,000 लोगों को जागरूक किया. इसके साथ ही महिलाओं के लिए सिलाई और वोकेशनल ट्रेनिंग सेंटर भी शुरू किए गए.
डायरी का वो पन्ना जिसे वो दिखाना नहीं चाहती
सैंड्रा जब बहुत कम उम्र में अकेले भारत आई थीं, तब उनके पास न तो कोई संगठन था और न ही कोई टीम. उन्होंने उस दौर में देर रात रेलवे स्टेशनों और अनजान सड़कों पर अकेले सफर किया. पीछे मुड़कर देखने पर सैंड्रा मानती हैं कि उन स्थितियों का अंजाम कुछ भी हो सकता था, लेकिन उन्हें कोई पछतावा नहीं है. उनका मानना है कि किसी खास मकसद और मिशन को पूरा करने के लिए ही वे सुरक्षित रहीं.
सैंड्रा कभी धाराप्रवाह बंगाली नहीं सीख पाईं. शुरुआती दिनों में वे पूरी तरह अपनी स्थानीय टीम पर निर्भर रहीं. हालांकि, इस अनजान देश में उन्हें एक चीज़ से खास लगाव हो गया, आलू मुरी. सागर जाते समय डायमंड हार्बर पर रुककर आलू मुरी खाना आज भी उनकी पसंदीदा आदत है, जो उन्हें हमेशा घर जैसा सुकून देती है.
सैंड्रा के अनुसार, काम में असली चुनौती सरकारी प्रक्रियाएं नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अंतर थीं. स्विट्जरलैंड ने उन्हें अनुशासन, संरचना और समय की पाबंदी सिखाई, तो वहीं भारत ने उन्हें धैर्य, लचीलापन और हर चीज़ को नियंत्रित न करने की समझ दी. शुरुआत में बैठकों में देरी और चाय के लंबे ब्रेक से उन्हें निराशा होती थी, लेकिन जल्द ही वे समझ गईं कि सार्थक बदलाव और सामुदायिक रिश्ते जल्दबाज़ी में नहीं बनते.
सैंड्रा का मानना है कि वे भारत में केवल एक मेहमान
सैंड्रा का मानना है कि वे भारत में केवल एक मेहमान हैं. इसलिए उन्होंने कभी अपने विचारों को थोपने की कोशिश नहीं की, बल्कि स्थानीय ज्ञान और परंपराओं को प्राथमिकता दी. उन्होंने अपनी स्थानीय टीम को पूरी जिम्मेदारी सौंपी है, जो रोजाना के कामों का संचालन करती है. सैंड्रा कहती हैं कि बच्चों का अपनी पढ़ाई को बहुत सामान्य मानना और डॉक्टर, शिक्षक या कलाकार बनने के सपने देखना ही उनकी असली सफलता है.
सैंड्रा ने कई प्राकृतिक आपदाएं देखीं
बंगाल के चक्रवात-प्रवण क्षेत्रों में काम करते हुए सैंड्रा ने कई प्राकृतिक आपदाएं देखी हैं. स्कूल की इमारतों के नुकसान से ज्यादा उन्हें परिवारों को रातोंरात सब कुछ खोते देखना दुखी करता है. इस दौरान उन्हें गलतफहमियों का भी सामना करना पड़ा और कई बार लोगों ने उन्हें धर्म प्रचारक समझा. हालांकि सैंड्रा स्पष्ट करती हैं कि उनका मकसद कभी धर्म परिवर्तन कराना नहीं रहा, बल्कि उनके मन में सनातन धर्म और इसकी आध्यात्मिक परंपराओं के प्रति गहरा सम्मान है. उनका मानना है कि भारत ने उन्हें कठिनाइयों से लड़ना, सादगी और विनम्रता सिखाई है। बिना किसी नाम के चलाए जा रहे इस स्कूल और प्रोजेक्ट के जरिए वे आज भी शांति से जिंदगियां बदलने के काम में लगी हुई हैं।
संबंधित खबरें
चावल के दाने पर मां दुर्गा की तस्वीर, छोटन का विश्व रिकॉर्ड का सपना
2 days agoबंगाल: कांग्रेस-ममता को झटका, उपचुनाव में नंदीग्राम-रेजीनगर सीट BJP के नाम
3 days agoTMC के 10 बागी सांसद कहां हुए गायब? ओम बिरला के नोटिस का नहीं दिया जवाब
4 days agoउपचुनाव: नंदीग्राम सीट पर हसी रानी की जीत, सीएम सुवेंदु ने दी बधाई
4 days agoयूपी-बिहार से लेकर केरल तक बारिश का अलर्ट, इन राज्यों में आंधी की चेतावनी
4 days agoरोहित नोनिया के नाम से वायरल 'इनामी' पोस्टर ने मचाई हलचल
5 days agoबंगाल सरकार में मिथुन चक्रवर्ती को बड़ी जिम्मेदारी, मिला कैबिनेट रैंक
5 days agoक्या राजनीति को अलविदा कहने वाले हैं हुमायूं कबीर? आखिर क्यों छलके आंसू
5 days agoउपचुनाव 2026: 4 राज्यों की 6 सीटों पर वोटिंग खत्म, जानें कहां-कितना मतदान?
6 days agoहुमायूं कबीर पर एक्शन, उपचुनाव के बीच गिरफ्तार हुए AJUP विधायक
7 days agoन्यूज 24 पर पढ़ें देश, राष्ट्रीय समाचार (National News), खेल, मनोरंजन, धर्म, लाइफ़स्टाइल, हेल्थ, शिक्षा से जुड़ी हर खबर। ब्रेकिंग न्यूज और लेटेस्ट अपडेट के लिए News 24 App डाउनलोड कर अपना अनुभव शानदार बनाएं।
First published on:
Know More: Editorial Guidelines