उत्तर प्रदेश की सियासत में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले नया समीकरण चर्चा में है. एक तरफ AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी लगातार मुस्लिम बहुल इलाकों में रैलियां कर रहे हैं तो दूसरी तरफ उनकी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली ने बसपा के साथ गठबंधन के लिए खुले तौर पर तैयार होने की बात कह दी है. सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ मायावती के लिए दोस्ती का संदेश है या फिर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पर दबाव बनाने की रणनीति. क्या दलित और मुस्लिम वोटों की नई केमिस्ट्री यूपी की राजनीति बदल सकती है या यह सिर्फ सियासी संदेश भर है.
सहारनपुर से शुरू हुआ AIMIM का शक्ति प्रदर्शन अब बहराइच से सहारनपुर तक पहुंच चुका है. मुस्लिम बहुल इलाकों में लगातार रैलियों के जरिए ओवैसी अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं. शुरुआत बहराइच से की जहां पर समाजवादी पार्टी का दबदबा है और वहां से होते हुए सहारनपुर आए, जहां कांग्रेस के सांसद इमरान मसूद को सबसे मजबूत नेता माना जाता है लेकिन सहारनपुर की जमीन से अपनी सियासी ताकत दिखाकर असदुद्दीन ओवैसी ने मुसलमानो के बीच एक बड़ा संदेश देने की कोशिश की.
अब ओवैसी ने 25 जुलाई को मुरादाबाद के जामा मस्जिद मैदान में होने वाली जनसभा को लेकर पार्टी ने पूरी ताकत झोंक दी है. तैयारियों का जायजा लेने पहुंचे प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली ने दावा किया कि भीड़ इतनी होगी कि मौजूदा मैदान छोटा पड़ जाएगा. ऐसे में मंच को पीछे खिसकाया जा रहा है. साफ है कि AIMIM 2027 की लड़ाई को लेकर अब सड़क से लेकर मैदान तक सक्रिय नजर आ रही है. रैलियों के बीच सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश तब आया जब शौकत अली ने कहा कि अगर बहुजन समाज पार्टी चाहे तो AIMIM गठबंधन के लिए तैयार है. यह बयान ऐसे समय आया है जब विपक्षी खेमे में सीटों और सामाजिक समीकरणों को लेकर चर्चाएं तेज हैं. हालांकि, अब तक बसपा की ओर से इस प्रस्ताव पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है.
यूपी का सामाजिक गणित
- मुस्लिम आबादी करीब 19-20 फीसदी
- अनुसूचित जाति करीब 21 फीसदी
- यादव करीब 9 से 10 फीसदी
- अन्य ओबीसी सबसे बड़ा वर्ग
- सवर्ण करीब 18 से 20 फीसदी
कांग्रेस-सपा नहीं दे रही तवज्जो
कांग्रेस इस पूरे घटनाक्रम को ज्यादा तवज्जो देने के मूड में नहीं दिख रही. कांग्रेस का कहना है कि वह किसी दबाव की राजनीति नहीं करती और उसका फोकस INDIA गठबंधन को मजबूत करने पर है. पार्टी नेताओं का दावा है कि जनता भाजपा के खिलाफ मजबूत विकल्प चाहती है. समाजवादी पार्टी भी ओवैसी की सक्रियता को गंभीर चुनौती मानने से इनकार कर रही है. सपा का आरोप है कि AIMIM का मकसद सिर्फ विपक्षी वोटों का बंटवारा करना है. पार्टी का कहना है कि उसका PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक का सामाजिक गठजोड़ पहले से मजबूत है और ओवैसी की राजनीति से उसके जनाधार पर कोई असर नहीं पड़ेगा.
उधर, भाजपा विपक्ष के इन नए समीकरणों पर तंज कस रही है. भाजपा का कहना है कि कौन किसके साथ गठबंधन करता है, इससे उसे कोई फर्क नहीं पड़ता. पार्टी का दावा है कि 2027 में भी उत्तर प्रदेश में सरकार भाजपा की ही बनेगी.
फिलहाल ओवैसी का बसपा को दिया गया गठबंधन का प्रस्ताव सिर्फ एक बयान है. बसपा ने इस पर कोई संकेत नहीं दिया है. लेकिन इतना तय है कि 2027 से पहले यूपी की राजनीति में सामाजिक समीकरणों की नई चर्चा शुरू हो चुकी है. अब नजर इस बात पर होगी कि क्या यह प्रस्ताव सिर्फ राजनीतिक दबाव बनाने का हथियार साबित होगा या फिर चुनावी मैदान में कोई नया गठबंधन आकार लेगा.
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