उत्तर प्रदेश के बाराबंकी और प्रतापगढ़ जिलों से धोखाधड़ी का एक हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है. यहां जयप्रकाश सिंह नाम के एक व्यक्ति ने फर्जी दस्तावेजों के सहारे एक ही समय में दो अलग-अलग सरकारी विभागों में नौकरी हासिल कर ली. जांच में पता चला कि जयप्रकाश की नियुक्ति 1979 में प्रतापगढ़ के स्वास्थ्य विभाग में हुई थी, लेकिन उन्होंने 1993 में बाराबंकी के शिक्षा विभाग में शिक्षक के तौर पर भी नौकरी शुरू कर दी. सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि उन्होंने दोनों जगहों पर एक ही मार्कशीट और दस्तावेजों का इस्तेमाल किया और करीब 17 सालों तक दोनों विभागों से नियमित वेतन और भत्ते डकारते रहे.
आरटीआई से खुला राज और हुई FIR
यह जालसाजी इतने लंबे समय तक बिना किसी रोक-टोक के चलती रही, लेकिन साल 2009 में एक शिकायत ने इस पूरे खेल का पर्दाफाश कर दिया. आवास विकास कॉलोनी के रहने वाले प्रभात सिंह ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई जिसके बाद सूचना का अधिकार (आरटीआई) के तहत जानकारी मांगी गई. जब दोनों जिलों के सरकारी रिकॉर्ड्स का मिलान किया गया तो सच्चाई सबके सामने आ गई. दस्तावेजों से साबित हो गया कि जयप्रकाश एक ही समय में दो सरकारी पदों पर तैनात थे. इस खुलासे के बाद आरोपी के खिलाफ धोखाधड़ी और फर्जीवाड़ा करने की धाराओं में एफआईआर दर्ज की गई और उसे सस्पेंड कर दिया गया.
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कोर्ट का कड़ा फैसला और जेल की सजा
मामला अदालत में पहुंचने के बाद लंबी कानूनी प्रक्रिया चली और अभियोजन पक्ष ने पुख्ता सबूत पेश किए. बाराबंकी की मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट सुधा सिंह की अदालत ने सभी गवाहों और साक्ष्यों को सुनने के बाद जयप्रकाश सिंह को दोषी करार दिया है. कोर्ट ने इस अपराध की गंभीरता को देखते हुए आरोपी को सात साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है. इसके साथ ही दोषी पर 30 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है. कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए आदेश दिया है कि जयप्रकाश ने इतने वर्षों में सरकारी खजाने से जो भी वेतन लिया है, उसकी पूरी वसूली की जाए.
सिस्टम की खामियों पर खड़े हुए सवाल
इस मामले ने सरकारी विभागों की निगरानी प्रणाली पर भी बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं. यह बेहद हैरान करने वाला है कि डेढ़ दशक से ज्यादा समय तक एक व्यक्ति दो जिलों में काम करता रहा और किसी भी अधिकारी को इसकी भनक तक नही लगी. विशेषज्ञों का कहना है कि उस समय रिकॉर्ड्स का डिजिटल न होना इस तरह के फर्जीवाड़े का मुख्य कारण था. हालांकि अब आधार कार्ड और डिजिटल डेटा की वजह से ऐसे मामलों को पकड़ना आसान हो गया है. वरिष्ठ अभियोजन अधिकारियों के मुताबिक यह फैसला उन लोगों के लिए एक बड़ी चेतावनी है जो सरकारी तंत्र को धोखा देने की कोशिश करते हैं.