Allahabad High Court verdict: जस्टिस विवेक कुमार सिंह की सिंगल बेंच ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि आजकल अदालतों में एक नया चलन देखने को मिल रहा है. जब दो वयस्कों के बीच लंबे समय से चल रहे आपसी सहमति के संबंध टूटते हैं या उनमें खटास आती है, तो उन्हें आपराधिक रंग देने की कोशिश की जाती है. कोर्ट ने कहा कि एक समझदार और आत्मनिर्भर वयस्क को यह बात अच्छी तरह पता होनी चाहिए कि सिर्फ रिश्ता टूटने पर कानून की मदद से उसे अपराध नहीं ठहराया जा सकता.

क्या था पूरा मामला?

यह मामला उत्तर प्रदेश के प्रयागराज का है. पीड़ित महिला साल 2014 से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रही थी, तभी उसकी मुलाकात आरोपी युवक से हुई. महिला का आरोप था कि युवक ने शादी का भरोसा देकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए और बाद में मुकर गया. इस पर महिला ने 10 अगस्त 2019 को प्रयागराज में बलात्कार, मारपीट और धमकी देने की धाराओं में केस दर्ज करा दिया.

मुकदमे के बाद हुई थी शादी

एफआईआर दर्ज होने के बाद दोनों परिवारों ने बातचीत की और 27 अगस्त 2019 को एक आर्य समाज मंदिर में दोनों की शादी करा दी गई. हालांकि, शादी के बाद भी महिला ने केस वापस नहीं लिया और मुकदमों की पैरवी जारी रखी. उसका कहना था कि पति उसे पत्नी की तरह नहीं रख रहा है. इसके बाद जनवरी 2020 में पुलिस ने कोर्ट में चार्जशीट भी दाखिल कर दी, जिसे रद्द कराने के लिए पति ने हाईकोर्ट की शरण ली थी.

अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें

सुनवाई के दौरान आरोपी के वकील ने दलील दी कि दोनों पिछले 5 सालों से एक-दूसरे के संपर्क में थे. यह एफआईआर केवल एक टूटे हुए रिश्ते का गुस्सा है. वकील ने यह भी बताया कि महिला उच्च शिक्षित है और उसके पास एमए, एलएलबी और बीएड की डिग्रियां हैं. वहीं, महिला के वकील और सरकारी वकील ने इसका विरोध करते हुए कहा कि महिला का 5 साल तक शोषण किया गया और युवक ने केवल कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए दिखावे की शादी की थी.

कोर्ट का अंतिम फैसला

दोनों पक्षों को सुनने के बाद जस्टिस सिंह की पीठ ने कहा कि महिला इतनी पढ़ी-लिखी और समझदार है कि वह अपने फैसलों और उनके परिणामों को अच्छी तरह समझ सकती है. यह नहीं कहा जा सकता कि शारीरिक संबंध बनाने के लिए उसकी सहमति किसी धोखे या भ्रम में ली गई थी. कोर्ट ने माना कि यह साफ तौर पर एक प्रेम संबंध के टूटने का मामला है, इसमें कोई बलात्कार का अपराध नहीं बनता. अदालत ने स्थानीय कोर्ट में चल रहे इस मामले को समय की बर्बादी बताते हुए पूरी तरह खारिज कर दिया.