आगरा-बरेली एक्सप्रेसवे के निर्माण कार्य में अब काफी तेजी लाई गई है और उम्मीद है कि अगले साल दिसंबर तक इसे आम जनता के लिए खोल दिया जाएगा. नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एनएचएआई) इस प्रोजेक्ट के अलग-अलग चरणों पर मशीनों की संख्या बढ़ाकर दिन-रात काम कर रहा है. इस एक्सप्रेसवे के शुरू होने से आगरा और बरेली के बीच का 6 घंटे का लंबा सफर घटकर महज दो से ढाई घंटे रह जाएगा. इससे न केवल लोगों के समय की बड़ी बचत होगी, बल्कि ईधन का खर्च भी काफी कम हो जाएगा. परियोजना निदेशक उत्कर्ष शुक्ला के अनुसार, इस पूरे ग्रीन कॉरिडोर की कुल लंबाई 228 किलोमीटर है और इसे बनाने में करीब 7700 करोड़ रुपये की लागत आ रही है.
चार चरणों में बंटा प्रोजेक्ट और अब तक की प्रोग्रेस
यह विशाल प्रोजेक्ट कुल चार चरणों में तैयार किया जा रहा है, जिसमें से कुछ हिस्सों पर काम लगभग पूरा हो चुका है. पहला चरण मथुरा से देवीनगर (हाथरस) तक 66 किलोमीटर लंबा है, जो पूरी तरह तैयार हो चुका है और यहां गाड़ियों की आवाजाही भी शुरू हो गई है. दूसरे चरण में देवीनगर से कासगंज तक 57 किलोमीटर का हिस्सा आता है, जिसका 62 फीसदी निर्माण कार्य पूरा कर लिया गया है. तीसरे चरण में कासगंज से बदायूं तक 46 किलोमीटर का काम 28 फीसदी तक हो चुका है, जबकि बदायूं से बरेली वाले आखिरी हिस्से का काम अभी 16 फीसदी तक पहुंचा है. अधिकारियों का मानना है कि अगले 15 महीनों में बाकी बचा काम भी पूरा कर लिया जाएगा.
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15 जिलों को मिलेगा सीधा फायदा और शानदार सुविधाएं
आगरा-बरेली एक्सप्रेसवे बनने से उत्तर प्रदेश के लगभग 15 जिलों के लाखों लोगों को यातायात की एक आधुनिक और बेहतर व्यवस्था मिलेगी. यात्रियों की सुविधा और सुरक्षा के लिए इस पूरे रास्ते में 20 फ्लाईओवर, 26 अंडरपास, 6 रेल ओवरब्रिज और 5 बड़े पुलों का निर्माण किया जा रहा है. यह एक्सप्रेसवे आगरा और मथुरा जैसे शहरों को सीधे बरेली से जोड़ देगा, जिससे व्यापार और पर्यटन को भी नई रफ्तार मिलेगी. भारी जाम से जूझने वाले यात्रियों को अब इस कॉरिडोर के जरिए शहर की भीड़भाड़ से मुक्ति मिल जाएगी और सफर पहले के मुकाबले आधे से भी कम समय में तय हो सकेगा.
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ग्रीन कॉरिडोर से बदलेगी क्षेत्र की तस्वीर
यह एक्सप्रेसवे केवल एक सड़क नहीं बल्कि पश्चिमी और रुहेलखंड इलाके के विकास के लिए एक नई लाइफलाइन साबित होगा. ग्रीन कॉरिडोर होने की वजह से इसके आसपास पर्यावरण का भी ध्यान रखा जा रहा है और आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है. इस रूट पर चलने वाले वाहनों को कहीं भी रुकने की जरूरत नहीं पड़ेगी जिससे एक निरंतर गति बनी रहेगी. प्रशासन का पूरा जोर इस बात पर है कि समय सीमा के भीतर गुणवत्ता के साथ काम पूरा हो ताकि अगले साल के अंत तक पश्चिमी यूपी के लोग इस शानदार तोहफे का लाभ उठा सकें.
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